ग़ज़लकार प्रकाश कुरुक्षेत्री
की ग़ज़ल की दुनिया में आपका स्वागत है

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प्रकाश कुरूक्षेत्री – संक्षिप्त परिचय।

प्रकाश कुरूक्षेत्री एक उम्दा ग़ज़लगो है उर्दू ग़ज़ल हस्ताक्षर है
ज़ार अल्लामी खानदान से ताल्लुक रखते हैं और अरूज़,बहर में अच्छा कलाम कहते हैं तरन्नुम व तहत दोनों में ग़ज़ल कहते हैं।
अदबी संगम कुरूक्षेत्र, रजिस्टर्ड संस्था 56 वर्ष पुरानी है उसके सदस्य हैं।
इन्होंने कुरूक्षेत्र, अंबाला, चंडीगढ़, हरिद्वार, पटियाला,जींद, हिसार,रोहतक, पानीपत,करनाल, कैथल, सोनीपत, दिल्ली, नोएडा व हस्तिनापुर,मेरठ आदि शहरों में कवि सम्मेलन व मुशायरे में अनेक बार भाग लिया है। उन्होंने आकाशवाणी व टीवी चैनल पर भी मुशायरे में भाग लिया है।
उनकी ग़ज़लों पर पुस्तक प्रकाशनाधीन है।

मोबाइल नंबर
+91 94664 84993
गांव शमशीपुर
जिला कुरुक्षेत्र
हरियाणा

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Post #1

अश्क़ भी बेताब हैं रोया नहीं जाता ।
रात कटती है मगर सोया नहीं जाता ।
बेवफाई का हुनर तो सीख लूँ लेकिन ,
दाग़ को यूँ दाग़ से धोया नहीं जाता ।
रो रहा हूँ याद आये सब वही मंज़र ,
अब महब्बत बीज भी बोया नहीं जाता ।
अब तलक इस राज़ को मैं राज़ रखता था ,
बोझ नादाँ दिल से अब ढोया नहीं जाता ।
है परेशाँ तू मुझे ये बात चुभती है ,
देखकर हालात भी रोया नहीं जाता ।
आज तेरी आँख में बेशर्मियाँ देखी ,
शर्म को यूँ बेशर्मी से खोया नहीं जाता ।

© प्रकाश कुरुक्षेत्री Copyright

Post #2

तन्हा तन्हा पड़ी रो रही है ग़ज़ल ।
बंद कमरे में अब सो रही है ग़ज़ल ।
बह्र भी खो गयी है न जाने कहाँ ,
क्यूँ वजूद अपना अब खो रही है ग़ज़ल ।
बुद्धिजीवी बने घूमते हैं बहुत ,
बोझ अपना यहाँ ढो रही है ग़ज़ल ।
क्यूँ परेशाँ से रहने लगे हो जनाब ,
मेरे तो ज़ख़्म से धो रही है ग़ज़ल ।
चार मिसरे लिखे भी नहीं ठीक से ,
कैसे कह दूँ कि ये हो रही है ग़ज़ल ।

© प्रकाश कुरुक्षेत्री Copyright

Post #3

बस्ती ग़म की मेरी अब नगर हो गयी ।
खाई थी जो दवा बेअसर हो गयी ।
ज़लज़लों से निकल के मैं महफ़ूज़ था ,
अब यूँ लगता है मुश्किल डगर हो गयी ।
इस कदर डूब जाएंगे सोचा न था ,
अश्क़ की बूंद बहती नहर हो गयी ।
है यक़ीं अब हमें जन्म लेगी ग़ज़ल ,
उनके आने की हमको ख़बर हो गयी ।
इल्म ये आपकी मेहरबानी तो है ,
जाने कब ये ग़ज़ल औऱ बह्र हो गयी ।

© प्रकाश कुरुक्षेत्री Copyright

Post #4

शब भर उसे बैठे सँवारा मैंने ।
फिर रात भर उसको निहारा मैंने ।
बिखरी पड़ी थी ज़ुल्फ़ नागिन जैसे ,
देखा वहीं उसका नज़ारा मैंने ।
आवाज़ कोई दे रहा था मुझको ,
ऐसा लगा ख़ुद को पुकारा मैंने ।
था ख़्वाब कोई या हकीक़त शायद ,
समझा दुपट्टे को इशारा मैंने ।
खाके तरस फिर चाँद पे कल यारो ,
महबूब को छत से उतारा मैंने ।
दे दे उसे मेरे ख़ुदा क़ैद-ए-उम्र ,
जिसके लिए खोला पिटारा मैने ।

© प्रकाश कुरुक्षेत्री Copyright

Post #5

बात इशारों में मुझको बतानी पड़ी ।
कशमकश में महब्बत निभानी पड़ी ।
था दबाए जो बरसों किसी कोने में ,
वो कहानी मुझे फिर सुनानी पड़ी ।
मर गयी मछलियाँ भी तड़प कर जहाँ ,
तिश्नगी उस नदी पे बुझानी पड़ी ।
द्वार पे नाम उनके जलाकर दिया ,
ऐसे अबके दिवाली मनानी पड़ी ।
सादगी से भला उनकी उलझा ही क्यूँ ,
फिर से श्रृंगार को मुँह की खानी पड़ी ।
जो ज़मीं से फ़लक पे मुझे ले गया ,
ज़िन्दगी उसके कदमों बिछानी पड़ी ।

© प्रकाश कुरुक्षेत्री Copyright

Post #6

इस राजनीति जैसे मैं क्यूँ दलबदल लिखूं ।
दिल मानता नहीं कि कहानी नकल लिखूँ ।
मौला मेरे कलम को मेरी ऐसा ज्ञान दे ,
भूखा रहे न कोई भी ऐसी फसल लिखूँ ।
आलोचना की बात तो करते हैं सब यहाँ ,
सच बोलता नहीं जो कोई वो असल लिखूँ ।
कहते गजल ग़ज़ल को जो भी मेरी बज़्म में ,
सीखें चबा चबा के कोई ऐसा फल लिखूँ ।
महबूब की तो बात बहुत हो चुकी यहाँ ।
मैं सोचता हूँ माँ के लिए इक ग़ज़ल लिखूँ ।

© प्रकाश कुरुक्षेत्री Copyright

Post #7

यार मेरा कमाल करता है ।
बात भी बेमिसाल करता है ।
क्या दिखाऊँ उसे मै ज़ख़्म-ए-दिल ,
दर्द मेरा ख़याल करता है ।
लौट आओ ये दिल नहीं लगता ,
पत्ता पत्ता सवाल करता है ।
छोड़कर जाने वाला जाएगा ,
ख़ामख़ा क्यूँ मलाल करता है ।
जब उसे फ़र्क ही नहीं पड़ता ,
क्यूँ तू हिज़्र-ए-विशाल करता है ।
पूछ लो आके इन हवाओं से ,
कौन किससे बवाल करता है ।

© प्रकाश कुरुक्षेत्री Copyright


Post #8

इश्क़ करके गुलाब से मैंने ।
भर लिया दिल शबाब से मैंने ।
छोड़कर के पवित्र गंगा जल ,
हाथ धोए शराब से मैंने ।
उसने तोड़ा था दिल सवालों से ,
फिर रुलाया जवाब से मैंने ।
जो उसे देने को लिखा था वो ,
ख़त निकाला किताब से मैंने ।
छत पे ज़ुल्फ़ें सुखा रहा थे वो ,
छुप के देखा हिज़ाब से मैंने ।
असलियत जानने को चेहरों की ,
दोस्ती की नक़ाब से मैंने ।
रोज़ उनसे मिलाओगे मुझको ,
तय किया रात ख़्वाब से मैंने ।
दूर करली “प्रकाश” तन्हाई ,
गुफ़्तुगू की किताब से मैंने ।

© प्रकाश कुरुक्षेत्री Copyright

Post #9

आग में इश्क़ की वो जलता है ।
देखने को मुझे मचलता है ।
याद में रात भर मेरी ज़ालिम ,
करवटें रोज़ वो बदलता है ।
जान ले लेगी ये अदा उसकी ,
जब झुका के नज़र निकलता है ।
हुस्न का तो असर नहीं मुझपे ,
वो निगाहों से मुझको छलता है ।
वक़्त रोके कभी नहीं रुकता ,
रेत सा हाथ से फिसलता है ।
एक दूजे के हम न हो पाए ,
दुख यही बार बार खलता है ।
सूर्य कितना भी तेज़ हो जाये ,
धीरे धीरे “प्रकाश” ढलता है ।

© प्रकाश कुरुक्षेत्री Copyright

Post #10

क्यूँ कर रहे हो बात ये तकरार की यहाँ ।
करनी है गर तो बात करो प्यार की यहाँ ।
शिक्षा की आड़ में ये दुकानें हैं चल रही ,
पट्टी बंंधी है आँख पे सरकार की यहाँ ।
ऐसे कपूत से तो भले बेटियाँ ही हों ,
इज़्ज़त उछालते हैं जो घर बार की यहाँ ।
कश्ती को कोसते ही रहोगे तुम उम्र भर ,
मैं सोचता हूँ थी कमी पतवार की यहाँ ।
घर की ज़रूरतों ने मुसाफ़िर बना दिया ,
आती नहीं है याद अब इतवार की यहाँ ।
दीमक की तरह खा रहे वो लोग मुल्क को ,
तारीफ़ कर रहे हैं जो उस पार की यहाँ ।
क्यूँ इल्म को “प्रकाश” कोई पूछता नहीं ,
कीमत सी गिर गयी है ग़ज़लकार की यहाँ ।

© प्रकाश कुरुक्षेत्री Copyright

Post #11

ज़िन्दगी तेरे नाम लिख दूँगा ।
उम्र अपनी तमाम लिख दूँगा ।
ज़िक्र होगा नशे का जब जब भी ,
तेरी नज़रों को जाम लिख दूँगा ।
जोड़कर तेरी यादों के लम्हे ,
नींद अपनी हराम लिख दूँगा ।
हो परेशान तेरी यादों से ,
आख़िरी मैं सलाम लिख दूँगा ।
जिसको पढ़ के तू रातभर रोये ,
ऐसा कोई कलाम लिख दूँगा ।
जब जवानी ग़ुरूर हो जाये ,
ज़िन्दगी ढलती शाम लिख दूँगा ।
गर ख़ुदा का कोई पता पूछे ,
माँ के चरणों को धाम लिख दूँगा ।

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Post #12

खून बनके रगों में बिखर जाऊँगा ।
रूह में मैं तेरी यूँ उतर जाऊँगा ।
लौट आने की झूठी कसम खाओ तुम ,
उम्रभर के लिए मैं ठहर जाऊँगा ।
इश्क़ तेरा सम्भाले हुए है मुझे ,
तूने छोड़ा तो पल में बिखर जाऊँगा ।
गर बितानी पड़े ज़िन्दगी बिन तेरे ,
सोचकर बात ये मैं सिहर जाऊँगा ।
तू चली जायेगी बाहें महबूब की ,
मैं तड़पता बता अब किधर जाऊँगा ।
जंग खाया अयस हूँ मैं पारस हो तुम ,
छू लो आके मुझे मैं निखर जाऊँगा ।

© प्रकाश कुरुक्षेत्री Copyright

Post #13

कदम कदम पे बहुत लड़खड़ा रहा हूँ मैं ।
न जाने दोस्ती ये क्यूँ निभा रहा हूँ मैं ।
वो वक़्त आ ही गया है नदी भी है तन्हा ,
किनारे ख़ुद को अकेला रुला रहा हूँ मैं ।
रहा न कोई मुसाफ़िर जो साथ चल पाए ,
ग़ज़ल अकेले खड़ा गुनगुना रहा हूँ मैं ।
बिगड़ रहे हैं मेरे काफ़िये रदीफ़-ओ-ग़ज़ल ,
सुकूँ के नाम पे ये क्या लुटा रहा हूँ मैं ।
जो दोस्तों में जलाई थी रोशनी के लिए ,
उसी शमॉं से ही दिल को जला रहा हूँ मैं ।
कोई तो रोक लो मुझको ग़ज़ल सुनाने से ,
ग़ज़ल समझ के हकीक़त सुना रहा हूँ मैं ।

© प्रकाश कुरुक्षेत्री Copyright

Post #14

हुआ जो इश्क़ में नाकाम तुम समझ लेना ।
जुड़ा है मुझसे तेरा नाम तुम समझ लेना ।
ज़माने भर में मेरा नाम हो भी जाये मगर ,
गली गली मुझे बदनाम तुम समझ लेना ।
तेरी ख़ुशी के लिए ख़ुद को बेचना हो अगर ,
उसी घड़ी मुझे नीलाम तुम समझ लेना ।
पिया था पिछली दफ़ा जो तेरी निगाहों से ,
वो आख़री था मेरा जाम तुम समझ लेना ,
बना दिया है ख़ुदा मैंने एक पत्थर दिल ,
लगा है मुझपे ये इल्ज़ाम तुम समझ लेना ।
गये हो इतनी हक़ारत से देखकर मुझको ,
गिरा है आज मेरा दाम तुम समझ लेना ।
गुज़र रही है मेरे दिल पे क्या बताऊँ तुझे ,
ग़ज़ल कहूँगा सरेआम तुम समझ लेना ।

© प्रकाश कुरुक्षेत्री Copyright

Post #15

उम्मीद में था फूल की पत्थर मिला मुझे ।
इक तेज़धार पीठ पे ख़ंजर मिला मुझे ।
हर ईंट जिसके सर से गुज़र कर महल बना ,
देखा जब उस ग़रीब को बेघर मिला मुझे ।
तो क्या हुआ फ़लक पे ठिकाना बना लिया ,
इंसान पर वो सोच से बेज़र मिला मुझे ।
बाँटे ही जा रहा था जो चेहरों पे रौनकें ,
दिल में उसी के ग़म का समंदर मिला मुझे ।
चौराहे पे खड़ा जहाँ बरगद का पेड़ है ,
उस गाँव का हर आदमी बेहतर मिला मुझे ।
पहचान आदमी की भला खो रही है क्यों ,
रोता हुआ ये देख के बन्दर मिला मुझे ।
कबसे भटक रहा था तलाश-ए- सुकून में ,
कदमों में मेरी माँ के मेरे घर मिला मुझे ।
कीड़े सी ज़िंदगी थी ज़माने की भीड़ में ,
साहित्य की पनाह में आदर मिला मुझे ।

© प्रकाश कुरुक्षेत्री Copyright

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