कवि डा०आर०बी०कपूर की दुनिया में आपका स्वागत है

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© इस पृष्ठ की समस्त बौद्धिक संपदा अधिकार ‘डा ० आर० बी ० कपूर’ के पास सुरक्षित हैं। बिना पूर्व लिखित अनुमति के किसी भी भाग की अनुकरण, पुनर्प्रकाशन या वितरण प्रतिबंधित है।

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परिचय –

ये डा ० आर० बी ० कपूर हैं । इनका जन्म 1अप्रैल 1957 को पंजाब के रोपड़ जिले में हुआ था । श्री (स्र्वर्गवासी ] राम सरूप तथा श्रीमति (स्वर्गवासी ) कौशल्या वति इनके माता पिता हैं । इन्होंने 1980 में गवर्नमैंट मैडीकल कालेज पटियाला पंजाब से एम० बी ०बी ० एस की पढ़ाई की है तथा इसी कालेज से आंखों का पोस्ट ग्रेजुएट डिपलोमा 1986 में किया । ये अब करनाल . हरियाणा के निवासी है तथा वहां पर ही अपनी मैडीकल की प्रैक्टिस करते हैं अपना अस्पताल चला रहे हैं । करोना काल के दौरान इन्होंने साहित्य में रुचि लेनी आरम्भ की और कविताएं लिखनी शुरू की । ये ग़ज़ल लेखनऔर शेरो शायरी में भी रूचि रखते हैं । ये अब तक अपनी कविताओं की किताब जिसका नाम है -‘ मैं और मेरे अल्फाज़ ‘ पिछले ही साल सौ कविताओं का संग्रह छिपवाया है । इसके इलावा दो और सांझा संकलनों में दस दस कविताएँ इनकी छपी हैं । इनको अपनी कविता ‘गुमनाम शायर ‘ बहुत पसंद है । यहां करनाल के सीनीयर सिटिजन कल्ब में अपनी रचनाएं सुनाते रहते हैं । करनाल में ही छोटे मोटे कवि सम्मेलनों और मुशायरों में भाग लेते रहते हैं । अपने अस्पताल में व्यस्त रहने की वजह से ज्यादा भागीदारी कर नहीं पाते हैं । इनका पता है –

डा ०आर बी कपूर
1349 , सैक्टर 6 . करनाल
हरियाणा 132001

मोबाइल नः है
94161 60192

Post #1 वो आखरी सफा

हमें अब तक याद है
उसका हर वो फलसफा
वो स्कूल की कापी का
जो होता था आखरी सफा
उस पर ही तो मार के
टेढ़ी मेढ़ी चंद लकीरें हम
चैक करते थे पैन अपना
लिखता है या नहीं
उसी सफे के एक कोने से
पोंछ लेते थे निब पैन अपने की
उसी आख़री सफे पे
करके देख लेते थे हम
जमां गुणा के रफ सवाल
.बेझिझक कर लेते थे इस्तेमाल
हर रफ काम के लिये उस पेज को
कापी के उसी आखरी सफे पे
नोट कर लेते थे हम
टीचर के बताए हुए
गैस पेपर के जरूरी सवाल
और रट लेते थे घर जाके
वही सवाह पक्के पेपरों से पहले
यही था कापी का वो सफा आखरी
जिसपे लिख लिया करते थे हम
अपने फिल्मी गाने पसंदीदा
यही होता था वो सफा
जिस पर लिखके संदेशा अपना
दूर से ही दिखा देते थे दोस्तों को
चलते हुए बोरिंग पीरियड में
कापी के इसी आखरी सफे पे
पेपर में मिले नम्बरों का हम
निकालते थे प्रतिशत व पुज़ीशन
यही था वो कापी का सफा आखरी
जिसको फाड़ कर हम
जहाज बना कर
उड़ाते थे क्लास में
यही होता था वो सफा
जिस पे मार के हम लाइनें
टिक-टोक-टो की गेम खेलते थे
लिख लेते थे इसी सफे पे
बात कोई याद रखने वाली
इसी आखरी पेज के
निचले हिस्से से टेढ़ा मेढ़ा
फाड़ लेते थे एक टुकड़ा
कुछ लिख के देने के लिये किसी को
और यही कापी का आखरी सफा
काम आता था बनाने को
व्यंगमय चित्र टीचर का
आम नहीं खास होते थे ये
स्कूल की कापी के सफे आखरी
वो चंद लकीरें जो उनपे
खींची थी हमने कभी
मासूम बचपन का वो
एक अनमोल खजाना था
वो धरोहर है यादों की
कुछ मस्ती की कुछ वादों की
दोस्तो जिन्दगी की नोट बुक के भी
अब चल रहे हैं कुछ सफे आखरी
इन पे भी लिख जाओ कुछ ऐसा
जिसे याद रखें तुम्हारी ही आने वाली पीढियाँ
जगह तो अभी भी है बहुत
बची पड़ी उस आखरी सफे पे
धर्म और सियासत से ऊपर उठ कर
लिख जाओ कोई लेख ऐसा
कविताएँ कुछ ऐसी
कुछ ऐसी दास्तानें
जिन्हें याद करें सदियों तक
आने वाले ज़माने

© डा आर बी कपूर Copyright

Post #2 शराब

हम पीते नहीं लोग कहते हैं
बहुत गरूर है तुममें
अरे शराब का क्या है
सब जानते हैं
बेशुमार सरुर है इसमें
माना बहुत कड़वी है ये
पर जिन्दगी की कड़वाहट
से तो कड़वी नही
कड़वाहट नहीं दिखती
जब साकी हो खूबसूरत
साकी नहीं तो क्या
बोतल को ही समझलो साकी
मुँह लगाके इस साकी को
पीजाओ आखरी बूँद तक
बचे न जरा भी बाकी
इसके सरूर में तो
नशा है शवाब का
सारे गम ये भुला दे
एहसानमंद हो शराब का
यूँ तो कहने को
बहुत खूबसूरत है ये जिदगी
पर लोग पी पी के जवानी में
जिगर गला लेते हैं
फिर बेठे रहते हैं पैखाने में
हमने तो जिगर वाले
बुढे बुढ्ढे भी देखे हैं मयखाने में
इस मय को क्यों बदनाम करो
पीना न पीना तो है अपने ही हाथ
इस बेचारी अंगूर की बेटी ने
कब मना किया साथ न देने में

© डा आर बी कपूर Copyright

Post #3 ग्रुप

दोस्तो ये ग्रुप तुमसे है
तुम ग्रुप से हर्गिज़ नहीं हो
तुम भी कुछ लिखा करो
ग्रुप में कुछ पोस्ट किया करो
ग्रुप की कदर किया करो
ग्रुप में एक्टिव रहा करो
नई फोटो कोई डालके अपनी
गुप की नजर किया करो
जो कोई लिखता है पढ़ा करो
पढ़ के सब्र किया करो और
हौसला अवसाई किया करो
ग्रुप में सब बराबर हैं
कोई छोटा कोई बड़ा नहीं
प्रशंसा सब की किया करो
तंज न किसी पे कसा करो
महौल को अच्छा रखना है
ग्रुप को संजोके रखना है
ग्रुप का कोई मैम्बर रुठे न
ग्रुप न कोई जाये छोड़ के
सब में कोई कोई न कोई
तो हुनर है कोई टेलेन्ट है
बराबर एहमियत है सबकी
जाओ कोई उनको समझाओ
जाके कोई मना लाओ
जो किसी कारण रुठ गये हैं
गुप छोडकर चले गये है
जाओ कह दो जाके उनसे
कि तुम बिन ग्रुप अधूरा है
सन्नाटा सा है छाया हुआ
आओ तुम फिर आ जाओ
ग्रुप में रौनक लगा जाओ
फिर हम महफिल सजाएँगे
खुशियों को न्योते बांटेगे
हर्षोल्लास मनायेंगे
फिर वही ठहाके लगाएंगे

© डा आर बी कपूर Copyright

Post #4 जंग

जंग से कहां सुलझे हैं मसले आज तक
मसले तो सुलझते हैं टेबल पर बैठ कर
सदियों से होती आई हैं जंगें गर्मोजोशी में
आखिर में तो बैठना ही पड़ता है आमने सामने
जंग में कहां किसी की जीत होती है
हार हार हार, बस हार होती है
इंसानियत की हार , जमहूरियत की हार
इंसानियत खुद से शर्मसार होती है
जीतने वाले से पूछो हाल दिल का
खोखला हो चुका वो दिल बोझल है उसका
जीत भले ही गया हो जीतने वाला
बदले में उसने बस बददुआएँ ही पाई हैं
ये बद्दुआएँ उसे जीने न देंगी चैन से
‘आहें ‘मासूमों की न मरने भी देंगी चैन से
रातों को उठ उठके डर से चिल्लाएगा
खौफ जंग का जब उसे आके सताएगा
जंग में है विनाश और कुछ भी नहीं है
हर तरफ तबाही और बर्बादी का है मंजर
जिधर भी देखो पड़ी हैं गली सड़ी लाशें
किसी के अब्बू हैं वो किसी के हैं शौहर

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Post #5 डाक्टरी पेशा आज

काम अच्छे भी होते है
ओर होती हैं गलतियां भी
पेशा मेरा डाक्टरी भी
और है इंसानियत भी
हमें दुआएं भी मिलती हैं
और कभी कभी बददुआएं भी
गलतियां खुदा से नहीं
होती हैं इंसा से ही
खुदा का दर्जा देते हैं लोग
पर हम है तो इंसां ही
आज का मरीज़ बड़ा क्रूर हो गया
इंसानियत से बहुत दूर हो गया
किसी को अपने पैसे का
किसी को बल का गरूर हो गया
यही मरीज़ पहले था भीगी बिल्ली
आज जंगली सूअर हो गया
अपने पैसे और पदवी के
नशे में मदहोश हो गया
भूल के सब एहसानों को
एहसान फरामोश हो गया
डाक्टर की ज़रा सी गलती को
आज बख्शता नहीं है ये
जिन्दगी और मौत तो आज भी
है ऊपर वाले के हाथ में
पर मौत अस्पताल में हो कैसे गई
बात बर्दाश्त करता नहीं ये
सौ की जान बचा लो
कोई इनाम नहीं है
एक हाथ से मर गया
तुम्हारी फिर खैर नही है

© डा आर बी कपूर Copyright

Post #6 मूँगफली

चाहे खालो फली फ्रांसबीन की
या फिर खालो सोयाबीन की
चाहे खालो फली मटर की
या फिर खालो किसी दाल की
फलियों में जो असली फली है
मित्रो वो है अपनी मूँगफली
मूँगफली की कितनी ही वैरायटी
कोई मोटी कोई पतली
कोई टेढ़ी कोई गोल मटोल
किसी के अंदर एक दाना
किती के अंदर दो
और किसी किसी के अंदर तो
दाने निकलें तीन
कोई निकले मीठी
कोई जली हुई और
कोई निकले नमकीन
अलग अलग अंदाज़ हैं
खाने के भी मँगफली
कोई खाये मुँह से तोड़ के
ओर कोई खाये तोड़ के हाथ से
कोई खाये इसे गुड़ के साथ
और कोई खाये साथ रेवड़ी गचक के
कितनी सुन्दर दिखती है
गिरी ताँबे की परत समेत
कोई खाये उतार के परत और
कोई खाये इसे परत समेत
बंदे की फितरत तो देखो
पहले खाये मूँगफलियां वो बड़ी बड़ी
अंत में खाने के लिये अलग निकालता जाये
वो छोटी छोटी और जली हुई
कोई खाये खाने के बाद
कोई खाये बाद चाय के
खाते खाते मूंगफली का
गिर जाये अगर एक दाना
ढुँढता रहता है बंदा
जब तक न मिल जाये वो दाना
अगली मूंगफली खाने का नहीं मज़ा
जबतक न ढूँढ के खाले
वो गिरा हुआ दाना
मूंगफली खाके हाथ झाड़ के
फिर देखे वो गौर से
लिफाफे को झाड़ के
शायद एक आध और निकल आये
छिलकों के ढेर में हाथ मारता
कहीं कोई पड़ी तो नहीं रह गई
छिलकों में
फिर खाके हाथ मारता कपड़ों पे अपने
कहीं कोई गिरी तो नहीं कपड़ों पे
दोस्तो मूँगफली खाने का असली मज़ा तो
लोहड़ी से पहले है लोहड़ी के बाद नहीं
बचपन में खानी कब शुरू करी थी
ये भी तो सबको याद नहीं

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Post #7 सेना दिवस

ये सेना का शौर्य है
जो हम आज सुरक्षित हैं
इस भारतीय सेना का
हर भारतीय कर्ज़दार है
हम कर्ज़दार रहेंगे उम्रभर
उनकी पाक कुर्बानियों के
हम आज महफूज़ हैं बदौलत
उनकी ही शहीद जवानियों के
ज़रा आँखें अपनी नम कर लो
आज कुछ पल के लिये
उन मांओं उन बच्चों और
उन बेचारी विधवाओं के लिये
जो हर पल याद करते होंगे
खोये हुए अपनों को
क्या गुजरती होगी जरा सोचो
उन मासूमों के सपनों को
उनकी शहादत हमारे लिये
तो महज़ एक खबर है
सोचो उन परिवारों का
आज भी रखके बैठे जो सब्र हैं

© डा आर बी कपूर Copyright

Post #8 जिन्दगी

जिंदगी इस कदर निकल गई
कि इसकी कदर का न मौका मिला
हमने ज़िन्दगी को उस कदर देखा न था
जिस कदर दिखाई देती है वो
उस कदर न कभी हुई मुलाकात ज़िन्दगी से
जिस कदर कभी सोचा था हमने
ये कदर -बे कदर के खेल में
जिन्दगी हमसे बेखबर हो गई
बेखबरी का आलम था इतना
न ढूँढ पाने से हमको बेसबरी हो गई
बेसबरी की इन्तिहा तो तब हो गई
जब खबर आई एक दिन कि
ज़िन्दगी तो अलविदा कह गई

© डा आर बी कपूर Copyright

Post #9 जन्नत

गुनहगार तो हर शख्स है यहां
कोई थोड़ा कोई ज्यादा
फिर ज़न्नत बनाई किसके लिये
कौन उसका उठायेगा फायदा
खुदा या तो बता के रखे पहले से
गुनाह कितने हैं माफ
पाने के लिये ज़न्नत
ताकि हर कोई सोच ले
गुनाह करने से पहले
क्योंकि चाहिये तो सबको है ज़न्नत
नर्क तो न चहिये किसी को यहां
चाहे सब हैं वाकिफ भी
यहां के कायदे कानूनों से
बाज़ फिर भी आते नहीं
संगीन गुनाह करने से
जिन्दगी की जद्दोजहद में
इंसान कर बैठता है गुनाह
कई बार कसूर न होते हए भी
ठहरा दिया जाता है गुनहगार
गुनाहों का हो जब हिसाब
देखे तो सजा का
कौन है वाज़िब में हकदार
ले तभी फैसला खुदा
भेजना है किसको नर्क में
ज़न्नत का है कौन हकदार
ये दुनिया तो चाहती है
गुनाह भी करते जायें हम
और ज़न्नत भी बस हो अपनी
बेवकूफ इतना भी न
समझो उस खुदा को
वो तो रखे पूरा हिसाब
एक एक कर्म पूछा जायेगा
हर गुनाह कबूला जायेगा
तभी होगा इशारा जाने का
नर्क में या ज़न्नत में
खुशकिस्मत हैं वो जो
पा लेते हैं जन्नत
बाकी तो सबको बस
नर्क ही देता है पनाह

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Post #10 दोस्त और दुश्मन

दुश्मन ऐसे भी हैं जमाने में
जो इस्तेमाल करते है कंधा दोस्तों का
दुश्मन को सबक सिखाने के लिये
फिर भले ही वो कंधा टूट जाये
उतर जाये या जाम हो जाये
और दुश्मन ऐसे भी हैं ज़माने में
जो मुसीबत में दोस्ती का हाथ
बढ़ाते हैं दुश्मन की तरफ
फिर भले ही दुश्मन की आँखें हो जायें नम
या वो आँखें उठा न सके मारे शर्म के
‘ वसुधैव कुटम्बकम ‘ का नारा भी भाता है बस मेरे भारत को
ऐसा विचार तो ज़हन मेंआता नहीं है हर किसी के
ये हमारी विरासत है संस्कृति है हमारी
जो कूट कूट के भरी है खून में हमारे
हम कितने भी आधुनिक हो जायें भला
ये तो रहेगी सदा ही खून में हमारे

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Post #11 वैलेन्टाइन डे

अगर चाकलेट देने से ही
खुश होती महबूबा
फिर तो बचपन से ही
है हर लड़की महबूबा
गुलाब देने से ही अगर
जाहिर होती है मुहब्बत
तो आशिक बन चुके होते
माली पूरे शहर के
अरे प्यार का इज़हार तो
होना चाहिये दिल से
क्यों रचाते हो आडम्बर
हर वैलंटाइन डे पे
प्यार करने का वक्त क्या
सिर्फ वैलंटाइन वीक है
साल के बाकी दिन क्या
झक्क मारनी ठीक है
छोड़ो ये अंग्रेज़ों के चोंचले
बदल डालो ढंग इज़हार का
हर दिन हर वक्त करो
तुम इज़हार अपने प्यार का

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Post #12 हे शिव

हे प्रभु !हे शिव ! ये कैसी तेरी लीला
अपनी ही रक्षा करने
क्यों नही तुम आते
है शिव हे शम्भु
कहां हो तुम विराजे
वैकुण्ठ में या फिर कैलाश पे
या धरती पर ही
मंदिरो में हो साजे
कल ही ब्राज़ील में
जीसस की प्रतिमा पे
गिरी बिजली आसमानी
पहले भी गिर चुकी है
कितनी ही बार मंदिरों पे
तेरी यही बिजली आसमानी
कभी बम धमाके मंदिरों में
मस्जिदों में बम धमाके तो
आये दिन का काम हो गया
ये सब तुम्हारी ही शै है या फिर
तुम भी मजबूर हो
कुछ करने को
क्यों नहीं उतर आते तुम
जमीं पर
बचाने अपने आप को
या तुम इतने ही
कमजोर हो गये हो
या कलयुग का असर है
जो बचा नहीं सकते
अपने आप को
कहां गई वो शक्ति तेरी
शिव शक्ति जो कहलवाती है
कभी नहीं देखा कि तुम आये हो
बचाने अपने मंदिर मस्जिदों को
या फिर आये हो सजा देने
उन द्रिंन्दों को
जो नष्ट करते हैं तेरे
मंदिर मस्जिद या गिरजे
यूँ तो विश्वास उठ जायेगा
तेरे भक्तों का तुझ से
दिखाओ अपनी शक्ति
दृढ़ करो भक्तों की भक्ति
बार बार नमन है तुमको
हे मरे प्रभु
है शिव शम्भु
ऊँ नमः शिवाय

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Post #13 होली

होली ये कैसी होली है
ये तो है हड्दुंगबाजी
हमने तो रंग लगाना है
तुम चाहे हो या नहीं राज़ी
ये हर्षोल्लास का उत्सव है
हर कोई किसी से मुअत्सर है
फाल्गुन का महीना है
बसंत बहार का मौसम है
क्या कन्हैया ने होली
कभी ऐसी खेली थी
ये काले पीले गीले रंग के
पानी की बौछारें झेली थीं
ये कलयुग की होली है
वो द्वापर की थी होली
तब होती थी फूलों की होली
सूखे गुलालों की होली
मौसम में गर्मी आ गई है
दिलों में गर्मी न आने पाये
दुश्मन न कोई आज बन जाये
ये दोस्त बनाने का है उत्सव
सबको गले लगाने का उत्सव
होली को होली रहने दो
हड़दुंगबाजी मैं न बदलो

© डा आर बी कपूर Copyright

Post #14 गिले शिकवे

शिकवे बहुत हैं हमको इन सावन की बारिशों से
गिलों का अंत नहीं इन घटाओं से सावन की
शिकायतें करके देखलीं सावन से अनगिनत
पर कोई असर नहीं है इन बारिशों पे सावन की
उमड उमड़ के उठती हैं घटाएं ये सावन की
कभी उत्तर से कभी दक्षिण से इतनी डरावनी
इतने ज़ोर से बरसती हैं मनचली ये बांवरी
रोक लेती हैं रास्ते आके ये किसी वक्त भी
मूसलाधार हों अगर सड़कें हो जाती हैं जलमग्न
झड़ी लग जाये अगर बाढ के हो जाते हैं आसार
हो जाता है मुश्किल घर से निकल पाना
सारा दिन पड़े पड़े घर में हो जाते हें बेकार
बूंदाबांदी चलती रहे सारा दिन अगर
तो कीचड़ ही कीचड़ हो जाता है हर तरफ
ऐसे में फिसल जाने के हो जाते है आसार
बाहर निकलने से रोक लेता है ये कीचड़ का गुब्बार
सुबह सुबह उठ तो जाते हैं अला रम की बाँक से
लेकिन सैर पे निकलने से पहले ही
हो जाती है शुरु रिमझिम रिमझिम
कभी कम कभी ज्यादा बारिश ये सावन की
शिकायतें तो बहुत हैं हमको इन सावन की बारिशों से
पर कोई आसर नहीं है इन बहरी बारिशों पे

© डा आर बी कपूर Copyright

Post #15 आम

मई जून जुलाई तीन महीने असली गर्मी के
यहीं हैं तीन महीने दोस्तो
रसीले आम खाने के
लोग कहते हैं आम को फलों का राजा
इसी का रस निकाल के बना डाली
एक कम्पनी ने ड्रिक माज़ा
आम का सीज़न है भाई
आम का है बोलबाला
पहले आता है सफेदा
फिर आता है तोता
फिर सिंदूरी फिर कलमी
फिर आता दसहरी
फिर बारी आम लंगड़े की
आखिर में बारी चौसे की
कई खाये जाते हैं चूस के
और कई खाये जाते हैं काटके
क्या ले जाना है दुनिया से
खाया करो दिल बांट के

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