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नाम – सुधीर ढांडा कौल।
पिता – श्री लाल सिंह।
माता-श्री मती नरमा देवी।
जन्म-गाँव कौल जिला कैथल।
जन्म तिथि 20/12/1972
व्यवसाय – शिक्षक, अभिनेता, लेखक।
पत्र पत्रिकाओं मे रचना प्रकासित होती रहती हैं। स्कूल, कॉलेज, काव्य मंचों पर अपनी रचना देता रहता है।
-फिल्में बॉलीवुड, हरियाणवी में काम कर चुका है।
हरियाणवी इनोवेटिव फ़िल्म संस्था का सदस्य।
कई गीत मार्किट में आ चुके हैं कुछ आने वाले हैं।
अदबी संगम कुरुक्षेत्र के साझा संग्रह में रचना छप चुकी हैं।
हरियाणवी इनोवेटिव फ़िल्म संस्था व कई अन्य संस्थाओ द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।
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Post #1
देखो जल मग्न हुआ शहर,
सड़के भी अब बनी है नहर।
मोटर साइकिल, कार रुक गई,
पानी ने आज ऐसा डाया कहर।
किसान का तो होगा फायदा,
खुदा का न जाने क्या है इरादा।
पपीहा बोलता नजर आने लगा,
मोर मस्ती में झूम गीत गाने लगा।
लोगों के घरों मे घुस गया पानी,
जिधर भी देखे नजर आता पानी।
कल तक़ जो कहते थे बरसता नही,सुधीर”
अब वही कहते है रबा बहुत हो गया पानी।
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Post #2
रिश्ता
खून का हो या कच्चे धागे का
रिश्ता तो आखिर रिश्ता ही है।
चमन का माली से,जीजे का साली से,
कीड़े का नाली से, दशहरे का दिवाली से।
रिश्ता तो …….
सजनी का साजन से,घर का आँगन से,
नाग का नागिन से, चोली का दामन से।
रिश्ता तो ……..
मछली का पानी से,राजा का रानी से,
आकाश का तारों से,नदिया का किनारों से।
रिश्ता तो……..
राधा का श्याम से,रामायण का राम से,
घोड़े का लगाम से,मालिक का गुलाम से।
रिश्ता तो ……..
कल का आज से,मूलधन का ब्याज से,
सब्जी का प्याज से,शाहजहाँ का मुमताज से।
रिश्ता तो …….
म्यान का तलवार से,सैनिक का हथियार से,
डॉक्टर का बीमार से,बनिए का बाजार से।
रिश्ता तो………..
शायर का कलम से,प्रियतमा का सनम से,
सच्चाई का धर्म से,और मृत्यु का जन्म से।
रिश्ता तो………
नाविक का नाव से,और जूती का पाँव से,
पहलवान का दाव से,सुधीर का कौल गाँव से।
रिश्ता तो आखिर रिश्ता ही है।
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Post #3
हम भी छोड़ते थे कभी बनाकर कागज की कश्ती पानी में,
हम भूल गए ये सब बचपन के खेल, आकर के जवानी में।
मन को बहुत ख़ुशी देता था,कश्ती का यूँ पानी में छोड़ना,
कश्ती डूब न जाए ये सोचकर,याद आता है पानी में दौड़ना।
दिल बहुत उदास होता था जब कश्ती पानी में डूब जाती थी,
एक तो दिल दुःखी,दूसरा पानी में भीगने पर माँ डाँट लगाती थी,
जब से आई जवानी ‘सुधीर,वो बचपन न जाने कहाँ खो गया,
कश्ती बनाना सिखाता था जो ,वो पिता भी अब बूढ़ा हो गया।
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Post #4
आजकल शराफत का नाजायज फायदा उठाने लगे है लोग,
छोटी सी बात को बढ़ा चढ़ाकर कहने लगे है लोग।
अपने गरेबाँ में झांकते नही,
दुसरो पर इल्जाम लगाने लगे है लोग।
घर की बात अब घर मे निपटाता नही कोई,
घर बात को घर से बाहर पहुँचाने लगे है लोग।
इस युग मे शरीफो का साथ कोई देता नही,
जालिमो से खुश होकर हाथ मिलाने लगे है लोग।
जब कभी अन्याय का जिसने भी विरोध किया,
जमाने मे उसी पर उंगलियां उठाने लगे है लोग।
कन्या है देवी का रूप, ये जानते है सभी,
फिर भी गर्भ में इसे मरवाने लगे है लोग।
दूसरे लोगो से पैसा उधार ले तो लेते है,
देते वक्त बहाने बनाने लगे है लोग।
कोई डरता नही अब जुर्म करने से यहॉं,
जल्दी अमीर बनने की चाहत में मासूमों को उठाने लगे है लोग।
संयुक्त परिवार बहुत कम नजर आते है आजकल,
शादी होते ही एकल परिवार बसाने लगे है लोग।
देश मे पाश्चात्य करन इतना बढ़ गया है,
न चाहते हुए भी अपनी संस्कृति से दूर जाने लगे है लोग।
अब सच्चाई पर विश्वास कोई करता नही’ सुधीर,
झूठ पर झूठ बोलने वाले को महान बताने लगे है लोग।
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Post #5
देखे है बहुत से लोग मैंने इस जमाने में,
जो उठते ही पहुँच जाते है महख़ाने में।
न अपना न बच्चों का ख्याल होता है उन्हें,
बस मजा आता है उन्हें तो लुढ़क जाने में।
दस दस रूपए माँगते फिरते है लोगों से,
नशे में धुत पड़े नजर आते है फिर किसी नाले में।
मय भी क्या चीज बनाई है खुद इंसान ने,
उसे ही पी जाती है पीता है जो इसे पैमाने में।
जी भर की पीई तूने जिंदगी भर’सुधीर,
अब तो सम्भल जा,फायदा है इसे छोड़ जाने में।
Post #6
सच्चाई की राह पर चलना गुनाह है आजकल, बहुत लोगों ने भ्रष्टाचार का रास्ता चुना है आजकल।
गाय के नाम पर मारा जा रहा इंसान आजकल, गुंडे, ढोंगी और लुटेरे बन बैठे, भगवान आजकल।
खोल रखी लोगों ने झूठ की दूकान आजकल, कुछ नेता कर रहे सैनिकों का अपमान आजकल ।
बच्चे करते नही बूढ़े माँ बाप की कदर आजकल, गांव छोड़ के बच्चे शहर में जाकर बस रहे आजकल ।
लोग जाति और धर्म के नाम पर लड़ रहे आजकल, एक दूसरे की तरक्की को देखकर सड़ रहे आजकल ।
ये क्या हो रहा है मेरे देश में ‘सुधीर, आजकल, ये सोच सोच कर, कविता लिख रहे हम आजकल ।।
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Post #7
अब धीरे धीरे गर्मी बढ़ने लगी, देखो हर चीज अब तपने लगी।
बिन बिजली के गाँव व् शहर में, देखो साँसे भी अब घुटने लगी।
घर से बाहर कोई कैसे निकले, गर्म गर्म हवाएँ जो चलने लगी।
लोग अपने घरों में दुबकने लगे, बाजारों की रोनक भी खोने लगी।
गर्मी से पशु पक्षी सभी हाँपने लगे, तालाब बावड़ी सब सूखने लगी।
जानवर जंगल से दूर भागने लगे, जंगल में आग जो सुलगने लगी।
ओंठ सूखे से रहते है अब ‘सुधीर, अब प्यास भी ज्यादा लगने लगी।
सुधीर ढांडा कौल।
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Post #8
बरसात। बेमौसम अच्छी लगी दोस्तों ये बरसात, शिमला जैसा दिन हुआ, सर्दी जैसी रात।
आज पेड़ पोधे भी मस्ती में झूमने लगे, लहरा लहराकर एक दूसरे को चूमने लगे।
बादल उमड़ उमड़ कर फिर आने लगे, पंछी घोसलों से निकल कर चहचहाने लगे।
शरर शरर कर चल रह है ठण्डी ठण्डी हवा, गगन में उड़ते परिंदे है इस बात के गवाह।
देखो रुक गई बारिस, निकल आई है धूप, पल पल में बदल रहा मौसम अपना रूप।
कौन जाने कब बदल दे रब किसकी तकदीर, मत कर तू गरूर बन्दे, लिखता है ढांडा सुधीर ।।
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Post #9
अच्छा नही किया आपने रूठ कर मुझसे, जा बैठी बहुत दूर बस इतनी सी बात पर।
खाई थी कसमे जीवन भर साथ निभाने की, छोड़ दिया साथ मेरा बस इतनी सी बात पर।
संजोए थे सपने मिलकर जीवन रूपी गाडी चलाने के, हो गया एक पहिया अलग मुझसे, इतनी सी बात पर।
अक्सर कहती थी तू जी नही सकती बिन तेरे, दूर रहकर जी रही है तू बिन मेरे, इतनी सी बात पर।
गलती हो ही जाती है एक दूसरे से अ दोस्त, क्या इस तरह हो जाते है अलग, इतनी सी बात पर।
जरा सा भी सोच नही तूने, मुझसे दूर जाने से पहले, एक दम भूला दिया प्यार मेरा, इतनी सी बात पर।
कैसे कटेगी जिंदगी काश सोच लेती तू इतना’ सुधीर, ना पहुँचती बात आज तलाक तक, इतनी सी बात पर।
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Post #10
तेरी आशिकी ने मुझे फिर से जवान कर दिया, तेरी भोली सूरत ने दिल को परेशान कर दिया।
कब का छोड़ चुका था मैं ये आशिकी के रास्ते, तेरी मीठी बातों ने मेरा फिर उधर रुझान कर दिया।
तू पास आती है तो दिल फूल सा खिल उठता है, तेरी मुस्कुराहट वाहट ने मेरा जीना आसान कर दिया।
तेरी चाहत में खुद को मिटा देगें एक दिन सनम, सम्भाल के रखना, ये दिल मैंने तुझे प्रदान कर दिया।
तेरा मुझसे इस तरह मिलना लोगों से देखा न गया, तेरे घर बताकर ‘सुधीर, की जिंदगी में खड़ा तूफ़ान कर दिया।
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Post #11
खुद बिक गए हम तेरे लिए इश्क के बाजार में, आकर देख क्या से क्या हो गए हम तेरे प्यार में।
दिल लगाकर मैंने जिंदगी में बहुत बड़ी भूल की, सारा सारा दिन सड़कों पर खड़ा रहा, तेरे इन्तजार में,
इश्क की राह पर चलने वाला हर कोई बर्बाद हुआ, बहुत कम लोगों को मंजिल मिली, इस भरे संसार में।
इश्क के समन्दर में एक साथ चले थे हम तुम दोनों, खुद साहिल पर पहुँच गई, मुझे छोड़ गई मझदार में,
बेरहम तेरे दिए गमों का, कहीं भी इलाज न हो सका, सुधीर, तड़फते तड़फते चल बसा, इश्क के बुखार में।
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Post #12
इंसान
कुत्ते का पट्टा पकड़ कर चलने मे लोग अपनी शान समझते है, बूढ़े माँ बाप की सेवा करने मे लोग अपना अपमान समझते है।
पल में भूल जाते है वो लोग औकात अपनी, थोडा सा पैसा आने पर अपने आप को धनवान समझते है।
इश्क की राह पर चलना होता है बहुत कठिन, न जाने क्यों? लोग इस राह को इतना आसान समझते है।
इसयुग मे न जाने कितने बापू पैदा हो गए, ढोंगी और अत्याचारी होते हुए भी जिन्हें लोग अपना भगवान् समझते है।
टकटकी लगाकर देखते है लड़कियों को इस कदर, झुर्रियां पड़ जाने पर भी बूढ़े अपने आप को जवान समझते है।
बेखोप होकर करते है जुर्म आजकल अमीरजादे, क्योंकि शहजादे क़ानून को अपने बाप की दूकान समझते है।
अपने लिए तो सभी जीते है, दुनियाँ मे ‘सुधीर’ जो दूसरों के लिए जिए हम तो उसे ही सच्चा इंसान समझते
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Post #13
वह लड़की। 20 वर्ष पुरानी। जब वह अपने घर से निकलती है, उसे आती खेतों में फसले भी ख़ुशी से लहराने लगती है, मन्द मन्द गति से झूमती फसलें ऐसी लगती है, मानो उसके आने का स्वागत कर रही हों, जैसे जैसे वह पगडण्डी पर कदम बढ़ाती है, बागों में बहार आ जाती है।
लब दबाकर जब वह धीरे धीरे मुस्कुराती है, खिलती कलियों पर जवानी छा जाती है, मुस्कुराते हुए जब वह अपनी पलके उठाती है, मानों अँधेरी रात के बाद सुबह हो जाती है, जब वह बोलने लगती है, सारी दुनियाँ ही डोलने लगती है।
अपनी जुल्फों को जब वह चलते चलते हिलाती है, आसमां में काली सी घटा छा जाती है, उसकी मीठी आवाज सुनकर कोयल भी कूकना बन्द कर देती है, उसकी चढ़ती जवानी देखकर कलियाँ भी शर्मा जाती है, उसके आने से पहले ही हवा मुझे, उसके आने का सन्देश दे जाती है।
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Post #14
ड़की नही, आसमान से उतरी परियों की रानी है वो, खुदा कसम सच कहता हूँ मेरी जिंदगानी हैं वो, जब वह लाल सूट पहनकर आती है, , चारों ओर आग सी लग जाती है, जैसे ही वह मेरे गाँव की जमीं पर कदम रखती है, मेरे दिल की धड़कन बढ़ जाती है।
जब वह मुझे नजर आती है, मेरे इन्तजार की घड़ियाँ कम हो जाती हैं, मेरे आँगन के आगे से जब वह गुजरने लगती है, हम दोनों की प्यासी निगाहें एक दूसरे की निहारने लगती है, शरमा कर जैसे ही वह अपने कदम आगे बढ़ाती है, ‘सुधीर की आँखों में एक हल्की सी तस्वीर समा जाती है। सुधीर ढांडा कौल।
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Post #15
पाक को हमारा सन्देश।
जितना उठाना था उठा लिया तूने, फायदा हमारी शराफत का, अंदाजा नहीं शायद तुझे, पाकिस्तान हमारी ताकत का।
छोटा बच्चा समझकर माफ़ करते रहे अब तक हम तुम्हे, डरपोक, बुझदिल, और ताकत हीन समझता है तू हमे।
सम्भल सकता है तो सम्भल जा, अब भी वक्त है पाक, वरना पल मे उड़ती नजर आएगी हवा मे तुम्हारी ख़ाक।
भारत माँ के लाल है हम आँच न इस पर आने देगें, मर जाएगें मिट जाएगें पर कश्मीर न हाथ से जाने देगें।
अभी तो डटी नहीं सेनाएं हमारी पाक आकर मैदान मे, साथ देना छोड़ दे आतंकवाद का, वरना लहरा देगें तिरंगा तेरे पाकिस्तान मे।
हर बार बातें तो करता है दोस्ती की, पर दोस्ती का अर्थ जानता नहीं,
हम बाप है तुम्हारे पाक पर तू ये बात कदापि मानता नहीं।
अरे पाक पहले भी मुँह की खाई तूने इस बार भी खाएगा, भारत माँ की रक्षा के खातिर यहाँ का बच्चा 2 मौत से लड़ जाएगा।
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Post #16
इस भारत देश में हिन्दू हिन्दू को हिन्दू कहकर नही बुलाता, ब्रहामण, बनिया, जाट, राजपूत खत्री ये खुद को बताते है ।
अगर मुसलमां से पूछे कोई, तो खुद को मुसलमान बताते है, फिर इस देश के हिन्दू लोग खुद को हिन्दू किस मुंह से कहते।
सुना है मुसलमां बहुत कट्टर है अपने इस्लाम धर्म को लेकर, हिन्दू कमजोर कर रहे धर्म को विभिन्न जातियों के नाम देकर।
हिन्दू धर्म के ठेकेदार कहते है गरीब लोग हिन्दू धर्म छोड़ रहे है, वो ये क्यों नही सोचते, तुमसे तंग होकर ही वो मुख मोड़ रहे है।
धर्म कोई भी बुरा नही होता, लोगों की सोच बुरी होती है, क्योंकि उनके मुँह में राम राम मगर बगल में छुरी होती है।
भाई चारा रखना है तो मत पुकारो किसी को जाति के नाम से, जुर्म मत करो गरीबों पर,’सुधीर, रहने दो उन्हें भी आराम से।
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Post #17
दोस्तों जैसे जैसे गर्मी बढ़ती जा रही है, गाँव में बिताए दिनों की याद आ रही है।
जब नहाते थे मिलकर गाँव की नहर में, कच्चे आम तोड़कर खाते थे दोपहर में।
अब वो दिन गुजर गए बस यादें रह गई, याद कर उन पलों को मेरी आँखे बह गई।
यारो हम भी गाँव की मिट्टी में ही पले है, मेरे पाँव भी गाँव की गर्म रेत में जले है।
कभी सादगी नजर आती थी गाँव में, लोग इक्कठे बैठते थे पीपल की छाँव में।
मगर अब गाँव का माहौल बदल गया है, नशा शहरों की तरह गाँव में फैल गया है।
गाँव के रिस्तों को इस कदर करके दरकिनार, लड़के लड़की आपस में करने लगे है प्यार।
आजकल बच्चे हुए माँ बाप के काबू से बाहर, सुधीर, माँ बाप की इज्जत को कर रहे तार तार।
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Post #18
बारिश आई, आकर चली गई, मौसम को कुछ सुहाना कर गई,
कुछ तो मिलेगी गर्मी से राहत, धान लगाने की पूरी होगी चाहत।
किसानों के चेहरे अब खिल उठेगें, किसान धान लगाने मे अब जुटेगें।
आकाश मे बादल फिर छाए हुए है, लोग बारिश की आस लगाए हुए है।
सुधीर” ये सब उस प्रभु की माया है, जिसने भी ये सुन्दर संसार रचाया है।
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Post #19
हमे तेरी आँखों से पीने की आदत है, तुझे देखकर ही जीने की आदत है।
वर्षों बीत गए तू समझ न सकी हमे, हमे तेरी याद में अकेले रोने की आदत है।
तुझे मुस्कुराती देख, खुश हो लेता हूँ, मुझे महफ़िल में मुसकाने की आदत है।
तेरा गम क्या है ये जानते है सब लोग, हमे तेरा दिया जख्म छुपाने की आदत है।
तेरी अदा पर आज भी मरता है’ सुधीर, हमे तेरे सामने आकर ये दिखाने की आदत है।
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Post #20
मेरा गाँव कौल।
मेरे गाँव की देखो ये खूबसूरत दीवाली, लेकर आएगी ये समृद्धि और खुशहाली।
इससे बढ़ेगा हमारा आपस मे भाई चारा, मेरा गाँव लग रहा हैआज कितना प्यारा।
कपिल मुनि तीर्थ और गढ़ यहाँ की पहचान है, इन तीर्थों की खूबसूरती ही यहाँ की शान है।
इस धरती ने दिए है, ख़िलाडी और विद्वान, मेरे गाँव की धरती है बहुत पवित्र और महान।
मैंने इसमे जन्म लिया, इस पर है मुझे बहुत गर्व, बड़े हर्षोउल्लास से मनाया है दीवाली का पर्व।
आज सभी ने मिलकर 17501 दीप जलाए है, मेरे गाँव के लोग आज दुनियाँ भर में छाए है।।
अपने गाँव की मिट्टी को करता है नमन, सुधीर, मेरे दिल मे बसी है अब भी मेरे गाँव की तस्वीर।
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Post #21
मेरे दर्द की कहानी मेरे आँसू बता रहे है, रोकने से भी रुकते नही, बहते जा रहे है।
कितना गम है मुझे तेरी की बेवफाई का, आँखों के साथ साथ दिल को रुला रहे है।
किसी को भूल जाना आसान नही होता, आँखों से टपकते आँसू ये दिखा रहे है।
अपनी मीठी बाते में फ़सा कर लूट लिया बिताए जो तेरे संग वो पल याद आ रहे है।
आखिर तू झूठा ही निकला देख ले ‘सुधीर, तोड़ कर दिल मेरा फिर सामने आ रहे है।
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Post #22
स्कूल जाते बच्चों को देखकर, सड़क किनारे पत्थर तोड़ते बच्चे, सोचते है।
काश हम भी स्कूल जा पाते इन बच्चों की तरह हमारे हाथ मे भी इस हथौड़ी की जगह किताब और कलम होती। चाय की दुकान पर झूठे कप गिलास धोता हुआ बच्चा कार से उतरते बच्चों को देखकर मन ही मन सोचता है।
काश रब ने हमारी किस्मत भी ऐसी बनाई होती, क्या हमारे भाग्य में बर्तन धोने ही लिखा है।
इस खेलने की उम्र में हमे ये सब करना पड़ रहा है इस पेट की खातिर,
बाँस पर बंधी रस्सी पर नृत्य करती छोटी सी बच्ची सोचती है इतनी कम उम्र में मुझे ये सब करना पड़ रहा है इस पेट की खातिर।
सड़क पर आते जाते लोगों के जूतों पर पालिस करते बच्चे सोचते है क्या हम लोगों के जूते पालिस करने के लिए ही पैदा हुए है।
कूड़ा बिन कर पेट भरने वाले बच्चे सोचते है काश हमारा भी अपना घर होता।
एक तरह स्कूल जाने वाले, कार में चलने वाले बच्चे दूसर तरह ये गरीब बच्चे जो भूख की खातिर कम उम्र में इतना कुछ करते है। है तो दोनों ही बच्चे एक अमीर और एक गरीब, सुधीर, दोनों की खुदा ने लिखी है अलग अलग तकदीर।
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Post #23
सोचता हूँ कल और आज पर, मैं भी लिखू कविता प्याज पर।
सेब हुए सस्ते महगें हुए प्याज, गृहणी कैसे रखे रसोई की लाज।
हर सरकार में होती है जमाखोरी, इन दिनों होती है प्याज की चोरी।
इस देश मे कमी नही है प्याज की, बस नियत खराब है इस राज की।
प्याज ने सबके अब आँशु निकाल दिए, कांग्रेस राज में भाजपा ने सवाल किए।
क्या भाजपा ये जमाखोरी रोक पाएगी, सुधीर”क्या ये लोगों के आँशु पोछ पाएगी।
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Post #24
आजकल शराफत का नाजायज फायदा उठाने लगे है लोग, छोटी सी बात को बढ़ा चढ़ाकर कहने लगे है लोग।
अपने गरेबाँ में झांकते नही, दुसरो पर इल्जाम लगाने लगे है लोग।
घर की बात अब घर मे निपटाता नही कोई, घर बात को घर से बाहर पहुँचाने लगे है लोग।
इस युग मे शरीफो का साथ कोई देता नही, जालिमो से खुश होकर हाथ मिलाने लगे है लोग।
जब कभी अन्याय का जिसने भी विरोध किया, जमाने मे उसी पर उंगलियां उठाने लगे है लोग।
कन्या है देवी का रूप, ये जानते है सभी, फिर भी गर्भ में इसे मरवाने लगे है लोग।
दूसरे लोगो से पैसा उधार ले तो लेते है, देते वक्त बहाने बनाने लगे है लोग।
कोई डरता नही अब जुर्म करने से यहाँ, जल्दी अमीर बनने की चाहत में मासूमों को उठाने लगे है लोग।
संयुक्त परिवार बहुत कम नजर आते है आजकल, शादी होते ही एकल परिवार बसाने लगे है लोग।
देश मे पाश्चात्य करन इतना बढ़ गया है, न चाहते हुए भी अपनी संस्कृति से दूर जाने लगे है लोग।
अब सच्चाई पर विश्वास कोई करता नहीं’ सुधीर, झूठ पर झूठ बोलने वाले को महान बताने लगे है लोग।
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Post #25
गर्मी सहन नही होती जब से शहर में रहने लगे। शहर से गाँव अच्छे है, खुद से ही ये कहने लगे।
गाँव में बिजली कमआती है, फिर भी दिन कट जाते है। शहर में थोडा सा कट लग जाए, तो हा हा कर मचाते है।
गाँव के लोगो के पास कूलर, पँखे एसी कब होते थे, दिन पेड़ो के नीचे बैठते, रात को गली, या छत पर सोते थे।
चौपालों में बैठकर लोग दुःख सुख की बतियाते थे, कहा सुनी, गीले शिकवे सब वहीं बैठकर निपटाते थे।
शहरों में कहीं भी अपनापन नजर आता नही ‘सुधीर, शहरों की देखा देखी अब बदल रही गाँव की तस्वीर।
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Post #26
मुद्दतों बाद बातें हुई मेरी, गाँव की हवाओं से, हमे पसंद नही खेलना, किसी की भावनाओ से।
आज भी अपनापन नजर आता है हर गाँव मे, अब इजाफा हो रहा है, गाँव की सुविधाओं में।
अच्छा लगा मुझे, देखकर गाँव की वही है सादगी, शहर में आकर फस गए हम जहरीली हवाओं में।
दूध, लस्सी में मिठास है, खुशबू है अपने घर की, मिलावट नही, बुजुर्गो के आर्शीवाद और दुआओं में
महकती है शुध्द खुशबू गाँव की मिट्टी में आज भी, अंतर आया है जरूर कुछ कुछ उसकी अदाओं में।
आधुनिकता ने दूर कर दिया अपनो से अब,’ सुधीर, भला वो खुशबू है कहां, इन शहरो की फिजाओं में।
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Post #27
बचपन मे हम भी उड़ाते थे पतंग, उड़ाते उड़ाते हो जाती थी रात, छत पर बैठे बैठे करते रहते थे हम अपनी पतंग से दिल की बात,
दूसरों की पतंग काटने का हमे बहुत चाव था, और काट ही लेते थे, जब कट जाती थी पतंग हमारी झट छत से कूदकर भाग लेते थे।
दूसरों की पतंग काटने पर खुशी, अपनी कटने पर दर्द होता था, वो बचपन भी क्या खूब था, कभी दिल हँसता, कभी रोता था।
जब कभी देखते है उड़ती हुई पतंग तो बचपन याद आता है, थमता नही ये वक्त, कटी पतंग की तरह दूर निकल जाता है।
दूसरों की पतंग काटने में उस वक्त ‘सुधीर, माहिर हुआ करता था, उस वक्त मेरी पतंगबाजी का किस्सा जग जाहिर हुआ करता था।
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Post #28
दर्द कितना भी हो दिल में छुपा लेती हूँ, बैठकर तन्हाई में अक्सर आँशु बहा देती हूँ।
कभी खिलते फूलों की तरह मुस्कुराती थी मै भी, आज इन कच्चे मकानों की तरह खड़ी रहती हूँ।
करती हूँ बातें कभी कभी इन वीरान दीवारों से, अपने मन का हाल बस दीवारों को बता देती हूँ।
जब ऊब जाती हूँ दुनियाँ के शौर शराबे से’ सुधीर, तेरी यादों के सहारे यहाँ आकर खड़ी हो जाती हूँ।
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Post #29
खामोशी।
वो भी खामोश रहती है, मैं भी खामोश रहता हूँ, ना वो ही कुछ कहती है, ना मैं ही कुछ कहता हूँ।
कभी वो कूकती थी महफ़िल में कोयल की तरह, अब ना वो गुनगुनाती है, ना मैं कुछ गुनगुनाता हूँ।
अजनवियों की तरह निहारते है एक दूसरे को हम, जैसे ना वो मुझे जानती है, ना ही मैं उसे जानता हूँ।
ताला लग जाता दोनों के मुँह पर सामने आते ही, ना वो बात मुझसे करती है, ना मैं उससे करता हूँ।
बस उसको देखना ही अच्छा लगता है मुझे बहुत, ना वो मुझे देखे बिन रहती है, ना मैं देखे बिन रहता हूँ
उसका सादगी से रहना ही पसंद है मुझे आज तक, ना वो अपने घर मुझे बुलाती है, ना मैं उसे बुलाता हूँ।
जख्म दिल पे खाए दोनों ने बहुत प्यार में वर्षों पहले, ना जख्म ए दिल वो दिखाती है, ना मैं ही दिखाता हूँ।
काम कितना भी हो जरूरी घर पर हम छोड़ देते है, ना वो कभी काम से छुट्टी लेती है, ना कभी मैं लेता हूँ।
ये सिलसिला खामोशी का वर्षो से चल रहा’ सुधीर, ना खामोशी वो तोड़ती है, ना खामोशी मैं तोड़ता हूँ।
© सुधीर ढांडा Copyright
Post #30
देखने मे मीरा सी हो तुम, मेरे लिए हीरा सी हो तुम।
सर्दी में गर्म गर्म कॉफी जैसी, गर्मी में जलजीरा सी हो तुम।
फलों में है अंगूर सी मीठी, सब्जियों में खीरा सी हो तुम।
खुशबू देसी घी की तरह है तेरी सच मसालों में जीरा सी हो तुम।
जिसे भूल नही पाया ‘सुधीर, वही लड़की समीरा सी हो तुम।
© सुधीर ढांडा Copyright
Post #31
किताब में रखकर तुझको गुलाब भेजा है, लिखकर तेरे सवालों का जवाब भेजा है।
दिए है जो गम तूने मुझे जिंदगी भर के लिए, वर्षों बाद करके उनका तुझे हिसाब भेजा है।
तेरी खूबसूरती ने मेरे दिल को किया घायल, एक बेवफा का देकर तुझे खिताब भेजा है।
ले लेना तुम, इनकार मत करना गैर के हाथों, देकर तौफा मैंने पास तेरे एक जनाब भेजा है।
मिट जाएगी एक दिन ये जिंदगी तेरी ‘सुधीर, उसने शराब के संग जो तुझे ये कबाब भेजा है।।
© सुधीर ढांडा Copyright
Post #32
होली और पानी
होली है खुशियों का त्यौहार, अब फूलों की तुम करो बौछार।
ना भीगे दामन ना भीगे चोली, बिन पानी के तुम खेलो होली।
काले को तुम कर दो लाल, पानी की जगह लगाओ गुलाल।
छोडो पिचकारी से खेलना, किसी पर पानी मत उड़ेलना।
फूलों से करो तुम पूरा चाव, पानी का तुम करो अब बचाव।
कीचड़ गारे से बचने का करो जतन, दुनियां वालो पानी है अनमोल रत्न।
बच्चे बूढ़े और जवान मिलकर खेले होली, पानी बचाने का संकल्प के युवको की टोली।
आओ हम होली के दिन भी बचाए पानी, ऐसा न हो कल ये बन जाए एक कहानी।
यदि सुधीर तुम यूं ही पानी व्यर्थ बहाओगे, फिर एक दिन तुम सब पानी ढूंढते रह जाओगे।
© सुधीर ढांडा Copyright
Post #33
गाँव की होली।
याद आते है मुझे वो दिन, जब गाँव में खेलते थे होली, गाँव की गलियों में दौड़ती थी, हम बच्चों की टोली।
पकड़ कर लिटा देते थे, एक हम दूसरे को नाली में, कुछ लोग थे, जो पीते थे, भरकर शराब प्याली में।
हम रंग घोलकर कर बाल्टी में, देते थे भाभी पर उड़ेल, भाभी भी कोरडे में लपेटकर मारती थी कमर पर बेल,
कोरडे की मार से हमारे शरीर पर पड जाते थे निशान, बुरा नही मानते थे, भाभियों का सभी करते थे सम्मान।
कुछ लोग काले, कुछ पीले, कुछ नजर आते थे लाल, हम भी भाभी को पकड़ कर, गालो पर मलते थे गुलाल ।
शाम को भाभी बड़े चाव से हमे मिठाई खिलाती थी, सारे दिन की थकावट फिर पल में दूर ही जाती थी।
मगर अब जमाना बदल गया है, झगड़े का डर रहता है, फूलों से तुम खेलो होली सुधीर ढांडा बस इतना
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Post #34
संतो की वाणी।
लॉक डाउन में गीता, बाइबल और कुरान पढ़ रहा हूँ मैं गुरुग्रन्थ साहिब, और देश का संविधान पढ़ रहा हूँ मैं।
इंसान को इंसानियत के रास्ते पर ले जाते है ये सभी, गों में लिखी महान संतो की जुबान पढ़ रहा हूँ मैं।
आदमी नजर आता है दुनियाँ की भीड़ में चारों ओर, इन ग्रन्थों को पढ़कर बना हो जो इंसान पढ़ रहा हूँ मैं
इन सभी संतो की वाणी को समझना है बड़ा मुश्किल, इनमें लिखे श्रेष्ठ वचनों को करके आसान पढ़ रहा हूँ मैं।
बस इंसानियत के मार्ग पर ही चले इन्हें पढ़कर ‘सुधीर, फालतू की बातों से अपना हटाकर ध्यान पढ़ रहा हूँ मैं।
© सुधीर ढांडा Copyright

Post #35
हिंदुओं की रगो में अब मुस्लमानो का खून दौड़ेगा, देखते है कौन पहले अब नफरत की दीवार तोड़ेगा।
धर्म और जाति के नाम पर फैल रही जो नफरत देश मे, मिटाकर दिलों से उसे कौन इंसानियत से नाता जोड़ेगा।
खून का रंग लाल मिलेगा सभी का इस पूरे जहान में इस सच्चाई से भला इंसान कैसे अपना मुंह मोड़ेगा।
रब ने तो बस इंसान बनाया था खूसूरत इस जमी पर, क्या पता था इंसान ही इंसान का यूँ खून निचोड़ेगा।
बन्द करो ये जात धर्म की राजनीति अब देश मे ‘सुधीर, कोई पहचान नही पाएगा, जब ये खून नसों में दौड़ेगा।
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