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परिचय
हरिदत्त हबीब
पटियाला पंजाब 9814749868
प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह
1 इज़हार
2इबादत
3इल्तिजा
तक़रीबन आठ संकलनों में ग़ज़लें छप चुकी है
दिल्ली दूरदर्शन, जालन्धर दूरदर्शन , रेडियो स्टेशन पटियाला, जालन्धर, और दिल्ली रडियो स्टेशन पर प्रस्तुति। इसके इलावा कई पत्र एवं पत्रिकाओं में ग़ज़लें प्रकाशित हो चुकी हैं।
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #1
वो अगर प्यार से इक बार बुलाले मुझको
फिर उसी वक़्त ख़ुदा चाहे उठाले मुझको
मैं तो हूं चाक पे रक्खी हुई मिट्टी की तरह
अब ये मर्ज़ी है तेरी कुछ भी बनाले मुझको
मैने रक्खा है बुज़ुर्गों को ख़ुदा की मानिंद
ये ज़रूरी नहीं बेटा भी संभाले मुझको
मैं तो पत्थर से बना मोम का,जिसकी ख़ातिर
कर गया वो ही चिराग़ों के हवाले मुझको
रुठ कर बैठ गया यूं ही ज़हां वालों से
उसका एहसान है मुझ पर जो मनाले मुझको
हो गया प्यार तेरे साथ हुए सब दुश्मन
इन रक़ीबों से ख़ुदा आज बचाले मुझको
ले चलो साथ मुझे दूर है मंज़िल तेरी
राह में होगा अंधेरा तू जलाले मुझको
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #2
वो अगर प्यार से इक बार बुलाले मुझको
फिर उसी वक़्त ख़ुदा चाहे उठाले मुझको
मैं तो हूं चाक पे रक्खी हुई मिट्टी की तरह
अब ये मर्ज़ी है तेरी कुछ भी बनाले मुझको
मैने रक्खा है बुज़ुर्गों को ख़ुदा की मानिंद
ये ज़रूरी नहीं बेटा भी संभाले मुझको
मैं तो पत्थर से बना मोम का,जिसकी ख़ातिर
कर गया वो ही चिराग़ों के हवाले मुझको
रुठ कर बैठ गया यूं ही ज़हां वालों से
उसका एहसान है मुझ पर जो मनाले मुझको
हो गया प्यार तेरे साथ हुए सब दुश्मन
इन रक़ीबों से ख़ुदा आज बचाले मुझको
ले चलो साथ मुझे दूर है मंज़िल तेरी
राह में होगा अंधेरा तू जलाले मुझको
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #3
तेरी जानिब किसी का देखना अच्छा नहीं लगता
हमारे बीच में हो दूसरा अच्छा नहीं लगता
बना कर बुत तेरा करने लगा जब से इबादत मैं
न जाने क्या हुआ तब से ख़ुदा अच्छा नहीं लगता
कि जिस पर चल के मंज़िल तो मिले ईमान बिक जाए
मुझे ऐसा कोई भी रास्ता अच्छा नहीं लगता
पिलाई है मुझे उसने वो मय अपनी निगाहों से
किसी भी जाम का अब जायका अच्छा नहीं लगता
तुझे गैरों की महफ़िल में ग़ज़ल कहते हुए सुनकर
तेरे होठों पे अब लफ्ज़-ए-वफ़ा अच्छा नहीं लगता
मुहब्बत हो कि रंजिश हो हदों में ठीक रहती है
कोई हद से ज़ियादा हो ख़फा अच्छा नहीं लगता
© हरिदत्त हबीब Copyright

Post #4
एक दिल है ग़म हज़ारों और दवा कुछ भी नहीं
देख ली करके दुआएं फायदा कुछ भी नहीं
है हमारे चाहने से ही यहां उसका वजूद
हम न चाहें गर उसे तो फिर ख़ुदा कुछ भी नहीं
ये समझ आता नहीं वो है खफ़ा किस बात से
ख़ाब में आता तो हैं पर बोलता कुछ भी नहीं
कुछ हमारी भी कमी है कुछ तुम्हारी भी अना
सोच लें गर हम मिटाना, फासला कुछ भी नहीं
कुछ नहीं इसकी नज़र में जात मज़हब तख्तताज
इश्क तो अंधा है यारो देखता कुछ भी नहीं
दिल में मेरे बस गया है इस तरह का इक फ़कीर
मांगता सबके लिए है चाहता कुछ भी नहीं
एक पत्थर की इबादत रात दिन करते रहे
उम्र सारी कट गई लेकिन मिला कुछ भी नहीं
लोग कहते हैं सभी पर है नज़र उसकी मगर
ज़ुर्म होते देखकर वो बोलता कुछ भी नहीं
झूट को तुम झूट लिखना और सच को सच ‘हबीब’,
जान भी जाए तेरी तो सोचना कुछ भी नहीं
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #5
उसने मुड़-मुड़ के कई बार मुझे देखा है
ये अगर प्यार नहीं है तो बताओ क्या है
इश्क़ करना है तो फिर सोच समझ के करना
इश्क़ तो इश्क़ है गलियों में नचा देता है
सोचता हूं मैं तसव्वुर में हमेशा जिसको
मेरी ग़ज़लों में वही शख़्स छुपा रहता है
चोर नज़रों से मुझे देख रहा है फिर भी
यूं तो चेहरे पे नकाब उसने लगा रक्खा है
ये सुना है कि उसे नींद नहीं चैन नहीं
हाल उसका भी मेरे बाद मेरे जैसा है
बंदगी भूल गया और हुआ मैं काफिर
साथ तुम हो तो ख़ुदा याद किसे रहता है
प्यार बांटोगे तो फिर प्यार मिलेगा ए हबीब
उसने पाया है हमेशा जो लुटा देता है
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #6
ग़ज़ल
प्यास कहां बुझती है सहरा में जल लिखने से
बारिश नहीं हुआ करती है बादल लिखने से
कब से सुनने की कोशिश में लगा हुआ हूं मैं
छम-छम की आवाज़ न आई पायल लिखने से
मुझको कहती है लिखने से बाज़ आ जाओ
पागल हो जाओगे वरना हर पल लिखने से
कितने अरसे सेअटका था बस इक शे’र ग़ज़ल का
हुआ मुकम्मल उसकी आंख को बोतल लिखने से
हल करने से हल होता है हर इक मुश्किल का
कहां मसाइल हल होते है बस हल लिखने से
सच लिखने का अपने सर से भूत उतार हबीब
हो सकती है शहर में कोई हलचल लिखने से
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #7
ग़ज़ल
प्यार के लम्बें सफ़र में दूर तक साया नहीं
फिर न ये कहना किसी ने मुझको समझाया नहीं
दोस्तों ने ही किया होगा ये किश्ती में सुराख
अलविदा कहने मुझे दुश्मन कोई आया नहीं
जा तुझे भी प्यार हो जाए मुझे उसनेे कहा
ये दुआ या बद्दुआ थी मैं समझ पाया नहीं
सांस लेना ही अगर है ज़िंदगी तेरे लिए
ये समझले फिर तुझे जीना अभी आया नहीं
रोज़ होती थी मुलाकातें अकेले में मगर
मुझको है तुमसे मोहब्बत उसको कह पाया नहीं
लोग अब करने लगे ग़ज़लों का गजरेला ‘हबीब’
मैं भी उम्दा सा कोई इक शेर कह पाया नहीं
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #8
ग़ज़ल
प्यास कहां बुझती है सहरा पर जल लिखने से
बारिश नहीं हुआ करती है बादल लिखने से
कब से सुनने की कोशिश में लगा हुआ हूं मैं
छम-छम की आवाज़ न आई पायल लिखने से
मुझको कहती है लिखने से बाज़ आ जाओ
पागल हो जाओगे वरना हर पल लिखने से
कितने अरसे सेअटका था बस इक शे’र ग़ज़ल का
हुआ मुकम्मल उसकी आंख को बोतल लिखने से
हल करने से हल होता है हर इक मुश्किल का
कहां मसाइल हल होते है बस हल लिखने से
सच लिखने का अपने सर से भूत उतार हबीब
हो सकती है शहर में कोई हलचल लिखने से
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #9
ग़ज़ल
दवा तो क्या दुआ का भी असर मुझ पर नहीं होता
तेरे बिन हाल इस बीमार का बेहतर नहीं होता
नहीं मिलती मुझे मंज़िल भटक जाता में राहों में
सफ़र में ख़ूबसूरत आप सा रहबर नहीं होता
हमारे दम से ही तो है ज़माने में वजूद उसका
जो हम क़तरे नहीं होते तो फिर सागर नहीं होता
तुम्हारे रब से मुन्किर हूं ,अगर मैं भीड़ से कहता
मेरे कांधों पे मेरे दोस्तो ये सर नहीं होता
किसी से प्यार कर लेते अगर मेरी तरह तुम भी
तेरा दिल मोम का होना था यूं पत्थर नहीं होता
न होती एक भी मस्ज़िद न होता फिर कोई मंदिर
यहां लोगों के दिल में गर ख़ुदा का डर नहीं होता
ज़रूरी तो नहीं है ये, पढ़ा लिखा हो हर शाइर
पढ़ा लिक्खा भी हर इक आदमी शाइर नहीं होता
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #10
सारे जहां के ग़म मेरे कासे में डाल कर
जीता हूं किस तरह न मुझे ये सवाल कर
लगता नहीं है दिल कहीं उसका मेरे बगैर
पछता रहा है वो मुझे दिल से निकाल कर
मुमकिन है एक रोज़ वही डस भी लें तुम्हें
रक्खे हैं आस्तीन में जो सांप पाल कर
मैं दुश्मनों से भी नहीं करता हूं दुश्मनी
रक्खा है ख़ुद को प्यार के सांचे में ढाल कर
जाता नहीं है साथ किसी के ये मालो-जर
जो भी है तेरे पास उसे इस्तेमाल कर
रखना संभाल के तू मेरी सब निशानियां
रक्खूंगा मैं भी तेरे ख़तों को संभाल कर
तुम को पसंद हो न हो मेरी ग़ज़ल ‘हबीब’
मैने तो रख दिया है दिल अपना निकाल कर
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #11
वो जिसका नाम हर पल हर घड़ी मेरी ज़ुबां पर था
वही मेरा मुकद्दर हो कहां ऐसा मुकद्दर था
जनूने इश्क ने मेरे बना डाला ख़ुदा उसको
वो जो कल तक ज़माने की नज़र में एक पत्थर था
जलाने के लिए यूं तो हज़ारों घर थे बस्ती में
मगर दहशत पसंदों के निशाने पर मेरा घर था
बुझा डाला था मेरी तश्नगी को जिसने सहरा में
वो इक क़तरा भी मेरे वास्ते उस पल समंदर था
बड़ा ख़ुद्दार था उसने ख़ुदा से भी नहीं मांगा
गुज़ारा कर लिया उससे हुआ जो भी मयस्सर था
न अपनापन न उल्फत है न इसमें चैन मिलता है
इस आलीशान बंगले से वो कच्चा घर ही बेहतर था
लिखा करता था दिल की बात को खूने जिगर से जो
सभी के दिल में बसता है हबीब ऐसा सुखनवर था
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #12
उसने मुड़-मुड़ के कई बार मुझे देखा है
ये अगर प्यार नहीं है तो बताओ क्या है
इश्क़ करना है तो फिर सोच समझ के करना
इश्क़ तो इश्क़ है गलियों में नचा देता है
सोचता हूं मैं तसव्वुर में हमेशा जिसको
मेरी ग़ज़लों में वही शख़्स निहां रहता है
चोर नज़रों से मुझे देख रहा है फिर भी
यूं तो चेहरे पे नकाब उसने लगा रक्खा है
ये सुना है कि उसे नींद नहीं चैन नहीं
हाल उसका भी मेरे बाद मेरे जैसा है
बंदगी भूल गया और हुआ मैं काफिर
साथ तुम हो तो ख़ुदा याद किसे रहता है
प्यार बांटोगे तो फिर प्यार मिलेगा ए हबीब
उसने पाया है हमेशा जो लुटा देता है
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #13
दवा तो क्या दुआ का भी असर मुझ पर नहीं होता
तेरे बिन हाल इस बीमार का बेहतर नहीं होता
नहीं मिलती मुझे मंज़िल भटक जाता में राहों में
सफ़र में ख़ूबसूरत आप सा रहबर नहीं होता
हमारे दम से ही तो है ज़माने में वजूद उसका
जो हम क़तरे नहीं होते तो फिर सागर नहीं होता
तुम्हारे रब से मुन्किर हूं ,अगर मैं भीड़ से कहता
मेरे कांधों पे मेरे दोस्तो ये सर नहीं होता
किसी से प्यार कर लेते अगर मेरी तरह तुम भी
तेरा दिल मोम का होना था यूं पत्थर नहीं होता
न होती एक भी मस्ज़िद न होता फिर कोई मंदिर
यहां लोगों के दिल में गर ख़ुदा का डर नहीं होता
ज़रूरी तो नहीं है ये, पढ़ा लिखा हो हर शाइर
पढ़ा लिक्खा भी हर इक आदमी शाइर नहीं होता
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #14
ग़ज़ल
तेरी जानिब किसी का देखना अच्छा नहीं लगता
हमारे बीच में हो दूसरा अच्छा नहीं लगता
बना कर बुत तेरा करने लगा जब से इबादत मैं
न जाने क्या हुआ तब से ख़ुदा अच्छा नहीं लगता
कि जिस पर चल के मंज़िल तो मिले ईमान बिक जाए
मुझे ऐसा कोई भी रास्ता अच्छा नहीं लगता
पिलाई है मुझे उसने वो मय अपनी निगाहों से
किसी भी जाम का अब जायका अच्छा नहीं लगता
तुझे गैरों की महफ़िल में ग़ज़ल कहते हुए सुनकर
तेरे होठों पे अब लफ्ज़-ए-वफ़ा अच्छा नहीं लगता
मुहब्बत हो कि रंजिश हो हदों में ठीक रहती है
कोई हद से ज़ियादा हो ख़फा अच्छा नहीं लगता
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #15
अपने वतन की साख को घटने नहीं दिया
दुश्मन का एक दांव भी चलने नहीं दिया
इसके लिए जिए हैं इसी के लिए मरे
हमने कभी तिरंगे को झुकने नहीं दिया
सीने पे ख़ाई गोलियां पीछे नहीं हटे
दुश्मन को एक इंच भी बढ़ने नहीं दिया
वो
मैं आंधियों से लड़ता रहा रात भर मगर
लेकिन किसी चिराग़ को बुझने नहीं दिया
दुश्मन हैं जो भी मुल्क़ के उनपे भी है नज़र
उनकी किसी भी चाल को चलने नहीं दिया
रक्खा है बरकरार सदा इसकी शान को
इस मुल्क़ के मयार को गिरने नहीं दिया
कुर्बान हो गया है इसके लिए हबीब
सर को कभी भी हमने तो झुकने नहीं दिया
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #16
मैं ख़यालों में तेरा चिहरा लिए फिरता रहा
पत्थरों के शहर में शीशा लिए फिरता रहा
बेक़रारी,दर्द,आहें,टूटे अरमाँ और ग़म
दिल में अपने देखिए क्या क्या लिए फिरता रहा
बुझ न पाई तिश्नगी रह कर समंदर के क़रीब
मैं लबों पर हर घड़ी सहरा लिए फिरता रहा
हो नहीं पाई मुकम्मल उम्र भर मुझसे ग़ज़ल
मैं तेरे चिहरे सा इक मतला लिए फिरता रहा
घर न मिल पाया तुम्हारा ढूंडने से ऐ ‘हबीब’
मैं तुम्हारे शहर का नक़्शा लिए फिरता रहा
© हरिदत्त हबीब Copyright

Post #17
ख़ुदा ने ख़ुद तराशा है बड़े ही प्यार से उसको
तभी तो ढूंडते फिरते हैं हर पल आइने उसको
वो कितना ख़ूबसूरत है तुम्हे मालूम कैसे हो
कभी देखा नहीं मेरी नज़र से आपने उसको
उसे इक रोज़ कह बैठा नहीं तुमसा हसीं कोई
बहुत मग़रूर कर डाला बस इतनी ‘बात ने उसको
ं
मैं जितना चाहता हूं वो भी मुझको चाहता है क्या
किसी दिन पूछ लूंगा ये बिठा कर सामने उसको
हबीब इक शे’र क्या मिसरा नहीं होता था कल जिससे
बना डाला है इक शायर तुम्हारे साथ ने उसको
नहीं मिलता सभी को शाइरी का फ़न विरासत में
बना डाला सुख़नवर देखिए हालात ने उसको
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #18
मेरी आंखों को देके ख़्वाब इतने
हो गए क्यों ख़फा जनाब इतने
उसको पहचानना हुआ मुश्किल
ओढ़े फिरता है वो नक़ाब इतने
देखकर आपका हसीं चेहरा
खिल गए बाग़ में गुलाब इतने
सर पे साया रहा बुज़ुर्गों का
इसलिए हम हैं कामयाब इतने
इन्तिहा हो गई है सहने की
और कब तक सहें अजाब इतने
अब नहीं डूबने का डर हमको
पार हमने किए चनाब इतने
सबकी नज़रें टिकी हैं क्यों तुम पर
जब हैं महफ़िल में माहताब इतने
ये इनायत ‘हबीब’ है तेरी
वरना हम थे कहां खराब इतने
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #19
ख़ुद्दारियों ने पेट तो भरने नहीं दिया
लेकिन कभी इमान भी बिकने नहीं दिया
बच्चों की हर खुशी के लिए जी रहा हूं मैं
उनके किसी भी ख़ाब को मरने नहीं दिया
मैं तो तमाम उम्र लड़ा आंधियों के साथ
लेकिन किसी चिराग़ को बुझने नहीं दिया
रहबर ने जो दिखाई चले उस डगर पे हम
जब चल पड़े तो कारवां रुकने नहीं दिया
करने लगा वो वार तो तलवार गिर गई
मां की दुआओं ने मुझे मरने नहीं दिया
करता रहा रकीब मेरा कोशिशें मगर
उसकी किसी भी चाल को चलने नहीं दिया
बेटा तो अपने मुल्क़ पे कुर्बां किया मगर
इक अश्क़ मां ने आंख से गिरने नहीं दिया
होता बुलंदियों पे तुम्हारा हबीब भी
अपनों ने ही मगर उसे उड़ने नहीं दिया
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #20
मतलब का अब तो प्यार ज़माने में रह गया
मैं दुश्मनों को दोस्त बनाने में रह गया
आगे निकल गए हैं वो इख़्लाक बेच कर
पीछे मैं बस इमान बचाने में रह गया
अब क्या हुआ कि बोझ समझने लगे वही
ताउम्र जिनका बोझ उठाने में रह गया
कहता था जो करूंगा मैं पूरे सभी के ख़ाब
वो अपने मन की बात बताने में रह गया
वो ले गए हैं तोड़ के शाख़ों से फल सभी
मैं तो यहां दरख़्त लगाने में रह गया
करता रहा मैं दिल से सदा जिसका एहतराम
नीचा मुझे वो शख़्स दिखाने में रह गया
करना पड़ा सफ़र मुझे तन्हा तमाम उम्र
रूठे हुओं को मैं तो मनाने में रह गया
वो नफ़रतों की जंग में मसरूफ़ है मगर
मैं प्यार के चिराग़ जलाने में रह गया
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #21
यहीं कहीं पे हमारा भी गांव था यारो
तुम्हारे शहर ने उसको निगल लिया यारो
भटक रहे हैं यहां सब तलाश में जिसकी
नहीं मिला है किसी को भी वो ख़ुदा यारो
कई दिनों से मेरे साथ बोलता ही नहीं
पता नहीं है वो किस बात से ख़फा यारो
नहीं रहा है वो पहले सा प्यार लोगों में
चली है शहर में नफ़रत की अब हवा यारो
हमें ख़ुदा से भी प्यारा है ये वतन अपना
वतन पे दिल तो है क्या जान भी फ़िदा यारो
पराए मुल्क़ गये हम तभी कमाने को
हुनर का मोल यहां जब नहीं मिला यारो
किसी के कहने से लिखता नहीं ‘हबीब’ कभी
उसे दिखाई दिया जो वही लिखा यारो
© हरिदत्त हबीब Copyright

Post #22
हम तो हैं टूटे हुए पत्ते शज़र के
अब इधर के हैं न यारो हम उधर के
जब फ़लक छूने लगें उड़कर परिंदे
लोग रख देते हैं उनके पर कुतर के
दौर था कोई हमारा जब कभी हम
उनकी गलियों से निकलते थे संवर के
आ चुके हैं तंग इस जीने से इतना
देखते हैं अब किसी पे हम भी मर के
हो बुलंदी पर मियां जिनकी वजह से
हाल उनका पूछलो नीचे उतर के
लाश अपनी ही उठाए फिर रहे हैं
अब मुसाफ़िर ज़िन्दगी के इस सफ़र के
ज़हन में आए जो तेरे बस वही लिख
क्या लिखा तुमने लिखा जो नक़्ल करके
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #23
मेरे ख़्याल को ऊंची उड़ान दे मौला
हर एक दिल में जो उतरे ज़ुबान दे मौला
बना रहे हैं जो मजदूर घर तेरी खातिर
उन्हें भी रहने को कोई मकान दे मौला
लुटाएं जान जो अपने वतन पे हंस हंस के
हमारे मुल्क़ को ऐसे जवान दे मौला
भटक रहे हैं सफ़र में न जाने हम कब से
तू मंजिलों के हमें भी निशान दे मौला
उड़ेंगे जिसमें हमेशा हम अपनी मर्ज़ी से
हमें भी ऐसा कोई आसमान दे मौला
मेरे हबीब को ऐसी कोई ग़ज़ल देदो
उसे जहान में रुतबा महान दे मौला
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #24
मतलब का अब तो प्यार ज़माने में रह गया
मैं दुश्मनों को दोस्त बनाने में रह गया
अब क्या हुआ कि बोझ समझने लगे वही
ताउम्र जिनका बोझ उठाने में रह गया
कहता था जो करूंगा मैं पूरे सभी के ख़ाब
वो अपने मन की बात बताने में रह गया
आगे निकल गए हैं वो इख़्लाक से गिर कर
पीछे मैं बस इमान बचाने में रह गया
वो ले गए हैं तोड़ के शाख़ों से फल सभी
मैं तो यहां दरख़्त लगाने में रह गया
करता रहा मैं दिल से सदा जिसका एहतराम
नीचा मुझे वो शख़्स दिखाने में रह गया
करना पड़ा सफ़र मुझे तन्हा तमाम उम्र
रूठे हुओं को मैं तो मनाने में रह गया
वो नफ़रतों की जंग में मसरूफ़ है मगर
मैं प्यार के चिराग़ जलाने में रह गया
पल में वो ले गया था मेरी जां निकाल कर
मैं जिसको अपनी जान बनाने में रह गया
मेरे हबीब ने मुझे इक दाद तक न दी
मैं तो बस उसको शेअर सुनाने में रह गया
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #25
सारी धरती अंबर सारा है अपना
दो गज़ में अब कहां गुज़ारा है अपना
उसके हिस्से में हैं सूरज चांद मगर
बस इक टूटा हुआ सितारा है अपना
रास आई है उल्फत लोगों को लेकिन
होता क्यों हर बार खसारा है अपना
जिस पर हम तुम दोनों मिलते थे अक्सर
दरिया का वो एक किनारा है अपना
क्या मिल जाता है लोगों को लड़ भिड़ कर
ये सारा संसार हमारा है अपना
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #26
उसने मुड़-मुड़ के कई बार मुझे देखा है
ये अगर प्यार नहीं है तो बता फिर क्या है
ये नचा देता है गलियों में पहन कर घूंघरू
सोच कर इश्क़ करो इश्क़ मिटा देता है
चोर नज़रों से मुझे देख रहा है वो तो
अपने चेहरे पे नकाब उसने लगा रक्खा है
मेरे बगैर वो इक पल भी नहीं रह सकता है
अजनबी है वो मगर पहले कहीं देखा है
ये सुना है कि उसे नींद नहीं चैन नहीं
हाल उसका भी मेरे बाद मेरे जैसा है
मेरे करीब है वो फिर भी खफ़ा खफ़ा सा है
वो अजनबी है कहीं मैंने उसको देखा है
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #27
जब भी तेरी याद सताए तो हम थोड़ी पी लेते हैं
तन्हाई में दिल घबराए तो हम थोड़ी पी लेते हैं
रखते हैं सीने में अपने हम भी नाजुक सा इक दिल
चोट कोई दिल पर लग जाए तो हम थोड़ी पी लेते हैं
वैसे तो पीने का कोई शौक नहीं है हमको यारो
अंबर पर बादल छा जाए तो हम थोडी पी लेते हैं
पीने की आदत तो नहीं है होती है कुछ मजबूरी
रिश्तेदार कोई आ जाए तो हम थोडी पी लेते हैं
दिल है अपना नाजुक यारो मान लिया करता हूं
गर कोई धक्का कर जाए तो हम थोड़ी पी लेते हैं
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #28
दूर तक पानी ही पानी है अभी
पार ये किश्ती लगानी है अभी
काम मेरे हो रहे हैं ख़ुद-ब-ख़ुद
मुझ पे उसकी मेहरबानी है अभी
सूखने में वक्त लगता है जनाब
रिस रहा ज़ख़्मों से पानी है अभी
उम्र गुज़री अश्क़ बारी में तमाम
पर मेरी आँखों में पानी है अभी
ये भी अफ़साना बनेगी एक दिन
जो ज़रा सी इक कहानी है अभी
हो रहे हैं वार मेरी पीठ पर
दोस्तों की मेहरबानी है अभी
घर के आँगन में खड़ा पीपल का पेड़
बाप-दादा की निशानी, है अभी
आज भी दिल में मेरे बसता है वो
बात ये उसको बतानी है अभी
है यकीं मंज़िल पे पहुँचेगे ज़रूर
गर्दिसों में ज़िदगानी है अभी
बेवफा है वो मगर फिर भी मुझे
दोस्ती उससे निभानी है अभी
दास्तानों में सुनी नानी से जो
क्या कहीं परियों की रानी है अभी
साठ के गर हो गए तो क्या हुआ
दिल के कोने में ज़वानी है अभी
सोचना क्या कल के बारे में जनाब
घर के अन्दर दाल पानी है अभी
दर्द का ये राग मत छेड़ो ‘हबीब’
शादमां ये ज़िंदगानी है अभी
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #29
यहाँ चिराग़ मुहब्बत के जो जलाऐगा
उस आदमी से ज़माना ये ख़ार खाऐगा
जिसे न आए कभी प्यार के अलिफ़ बे पे
हमें वो ख़ाक मुहब्बत के गुर सिखाऐगा
लगेगी आग घरौंदे में एक दिन उसके
यहाँ पे घर जो किसी और का जलाऐगा
लिए फिरूं मैं हथेली पे जान -ओ दिल अपने
न जाने कब वो मेरा इश्क़ आजमाऐगा
मुझे यकीं है मेरे गीत,मेरी ग़ज़लों को
मेरा रक़ीब मेरे बाद गुनगुनाऐगा
उसे मिलेगी बुलन्दी हमेशा दुनिया में
गिरे हुओं को यहाँ शख़्स जो उठाऐगा
मेरे ख़याल में रहता है इक हसीं चेहरा
न जाने कब वो हक़ीक़त में नज़र आऐगा
तेरी तलाश तेरी जुस्तजू में हूँ मैं तो
मेरे ‘हबीब’ मुझे कब नज़र तू आऐगा
© हरिदत्त हबीब Copyright
Post #30
मुहब्बत के समंदर में उतर कर देख लेते हैं
बिगड़ता है कि बनता है मुकद्दर देख लेते हैं
कोई ख़्वाहिश न फिर कोई तमन्ना दिल में रहती है
हम अपनी जान को जब भी नज़र भर देख लेते हैं
कभी तन्हाइयों में जब हमारा दिल नहीं लगता
तुम्हारे ख़त पुराने हम उठाकर देख लेते हैं
उसे दिल की इबादतगाह में ऐसे बसाया है
कि जब भी दिल करे उसको नज़र भर देख लेते हैं
उन्हें कह दो हमें भी नाज़ है अपनी निगाहों पर
छुपे जो आस्तिनों में वो खंज़र देख लेते हैं
हमें आई नहीं अल्फाज़ की जादूगरी तो क्या
ग़ज़ल अपनी ‘हबीब’ उनको सुना कर देख लेते हैं
© हरिदत्त हबीब Copyright
At vero eos et accusamus et iusto.
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