मोहन लाल धर्माचार्य
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मेरा जीवन परिचय

मेरा जन्म हरियाणा प्रदेश स्थित जींद जनपद की नरवाना तहसील के गांव भाणा ब्राह्मणान् में पिता श्री रामदिया एवं माता श्रीमती मूर्ति देवी के घर हुआ।
बचपन गांव में ही व्यतीत हुआ। माता पिता की छांव में प्रारम्भिक शिक्षा गांव के स्कूल में ही हुई। दसवीं कक्षा के बाद बारहवीं तक की पढ़ाई नरवाना स्थित सिनियर सैंकेन्डरी स्कूल में हुई।
परिस्थिति वश आगे की पढ़ाई आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण छोड़कर पानीपत गया, जहां आर्य समाज की ओर झुकाव हुआ।
किसी सज्जन की सलाह से कुरुक्षेत्र पहुंचा और यहां शहर की अनेक सामाजिक व धार्मिक संस्थाओं से होते हुए अंत में महर्षि दयानंद सेवा सदन कुरुक्षेत्र में स्थाई आश्रय प्राप्त हुआ, जिसमें एक सज्जन का बहुत योगदान है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।
यहां रहकर संस्था की सेवा करते हुए कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से बी ए,एम ए (वेदाचार्य )व बी एड की परीक्षा उत्तीर्ण की।
इसी योग्यता के आधार पर आर्य समाज कुरुक्षेत्र में धर्माचार्य व पुरोहित के रूप में सेवाएं प्राप्त हुई।
विशेष उपलब्धियां :-1… सर्वप्रथम “ओ पी जिंदल -एक परिचय “नामक पुस्तक लिखी।जिसके लिए सांसद नवीन जिंदल, उपायुक्त टी के शर्मा व विधायक रमेश गुप्ता ने प्रशंसा पत्र भेंट किया।
2… दूसरी पुस्तक “वेद ज्ञान की राशि “प्रकाशित हुई।जिसका दो बार प्रकाशन हुआ, जिसकी अनुभूमिका पूर्व उपायुक्त डॉ रामभक्त लांग्यान व सुश्री सुमेधा कटारिया जी ने लिखीं।
3…”पंच महायज्ञ नित्य कर्म पद्धति “स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा रचित पुस्तक लगभग बारह बार सम्पादक के रूप में प्रकाशित करवाईं।
4…”आर्य युवक विश्वकीर्ति पुरस्कार “प्राप्त हुआ जो हर वर्ष पूरे भारत में एक सदस्य को दिया जाता है।
5… अनेक कविताओं का काव्य संग्रह रेडियो स्टेशन कुरुक्षेत्र से उद्घोषित हुआ।
6…वेद प्रचार प्रसार के लिए अन्तर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन न्यूयॉर्क, अमेरिका में भागीदारी दी।
7… वैदिक साहित्य सेवाओं को जन जन तक पहुंचाने के लिए कुलपति प्रो सचदेवा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय द्वारा सम्मानित किया गया।
8… श्रीमद्भगवद्गीता पर आधारित “गीता ज्ञान की राशि “नामक पुस्तक की रचना की,जिसके लिए आचार्य देवव्रत महामहिम राज्यपाल गुजरात द्वारा सम्मानित किया गया।
बन्धुओ !
वैदिक साहित्य की सेवा और भारतीय संस्कृति का प्रचार प्रसार कब मेरे जीवन का हिस्सा बन गये, ये पता ही न चला।
लेकिन मैं ये निष्पक्ष भाव से स्वीकार करता हूं कि मुझमें जो भी सार्थकता है उसका श्रेय केवल महर्षि दयानंद सरस्वती जी के जीवन चरित्र व उसकी राष्ट्र भक्ति को है।

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