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© इस पृष्ठ की समस्त बौद्धिक संपदा अधिकार ‘दीपक वोहरा’ के पास सुरक्षित हैं। बिना पूर्व लिखित अनुमति के किसी भी भाग की अनुकरण, पुनर्प्रकाशन या वितरण प्रतिबंधित है।

“© Copyright of this page is held by Deepak Vohra. All rights reserved.”

परिचय

नाम: दीपक वोहरा
कवि एवम् अनुवादक
शिक्षा: स्नातकोत्तर अंग्रेज़ी साहित्य
संप्रति: पीजीटी लेक्चरर इन इंग्लिश
प्रकाशन: कविताएं और अनुवाद विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में। हंस पत्रिका एवं वागर्थ पत्रिका में
पता: 2823/8, न्यू रमेश नगर
सदर बाजार
करनाल 132001 (हरियाणा)
📱 8950672635
ईमेल: deepakvohra081@gmail.com
भाषाएं: हिन्दी, अंग्रेज़ी, पंजाबी
लेखन: हिन्दी एवम् अंग्रेज़ी
जुड़ाव:
जनवादी लेखक संघ हरियाणा
की कोर कमेटी का सदस्य

Post1

यही समय है, सही समय है
यही समय है
सही समय है
जब हम कुछ कर सकते हैं—
मसलन,
अपने हक़ की बात कर सकते हैं,
रोज़ी-रोटी के लिए आवाज़ उठा सकते हैं।
कौन जाने
फिर समय मिले या न मिले,
या दिल मिले या न मिले।
यही समय है
सही समय है
जब हम चुन सकते हैं—
प्रेम या नफ़रत
प्रेम, जो संसार जीतता है,
नफ़रत, जो सदा हारती आई है
यही समय है
सही समय है
जब हम खोल सकते हैं
एक अधूरी किताब,
या याद कर सकते हैं
किसी भूले हुए दोस्त को,
जिसे कभी बहुत चाहा था
यही समय है
सही समय है
जब हम पढ़ सकते हैं
कोई कविता, कोई कहानी
या यूँ ही मोबाइल की स्क्रीन
बेमतलब स्क्रॉल करते हुए
समय भी गँवा सकते हैं
यही समय है
सही समय है
जब हमें बोलनी चाहिए
उन खामोश आवाज़ों की बात
जो भूख से पहले मर जाती हैं
उन बच्चों की
जो स्कूल नहीं
कारखानों में बड़े होते हैं
यही समय है
सही समय है
जब हम-तुम
अपने होने का मतलब
खोज सकते हैं,
और तय कर सकते हैं
कि इस दुनिया को
थोड़ा बेहतर बनाया जा सकता है
अगर हम सच में चाहें

Post 2

मेरे आँगन में हैं
मेरे आँगन में हैं
मुँह बाए खड़ी है
भुखमरी
बेरोज़गारी
क़र्ज़
जिल्लत
कैसे सत्ता का मैं गुणगान करूँ?
मेरे आँगन में हैं
मुँह बाए खड़ी है
टपकती छत
खाली थाली
अधूरी पढ़ाई
और माँ की आँखों में
धुएँ-सी चिन्ता।
पिता की हड्डियों में
अब दर्द नहीं
बस एक चुप्पी है,
जो हर चुनाव से पहले
और गहरी हो जाती है।
दीवारों पर चिपके हैं
वायदों के पोस्टर,
जो अब रंग छोड़ने लगे हैं
बारिश से नहीं
आशाओं के घिसते हुए हाथों से
मेरे आँगन में हैं
मुँह बाए खड़ी है
वो हर सूरत
जो ‘विकास’ के भाषणों में नहीं मिलती—
और मैं चाहता हूँ
कि कोई आये
सिर्फ़ ‘जुमले’ नहीं,
थोड़ा नमक
थोड़ी रोटी
थोड़ी इंसानियत भी दे जाए।

Post 3

तुम्हारे पाँवों के नक़्शे
तुम चले गए थे
अपने ही गाँवों से
शहर की ओर
एक जूट की बोरी में रखकर
थोड़ा नमक
थोड़ा चावल
और माँ के हाथ की गाँठ बाँधी हुई।
तुम्हारे पाँव
रेल की पटरियों से होकर
ईंट-भट्टों तक पहुँचे
जहाँ मिट्टी
तुम्हारे पसीने से
ईंट बनने लगी।
किसी ने नहीं लिखा
कि तुमने पुल बनाए
पर कभी उन पर चले नहीं।
कि तुमने इमारतें उठाईं
पर उनमें कभी सोए नहीं।
कि तुमने शहर बसाए
पर तुम्हारे लिए कोई ठिकाना न था।
मज़दूर भाइयों,
तुमको सब ने हिकारत की नज़र से देखा
मेहनती होने के बावजूद
तुम्हें कभी बिहारी
तो कभी भइया की उपाधि से नवाजा
जब-जब हमने विकास कहा
तुम्हारा नाम चुपचाप
उसके नीचे दबा रहा
जैसे नींव में पड़ा
कोई पत्थर।
तुम्हारे पाँवों के निशान
अब भी हैं
कंक्रीट की उस सड़क पर
जो गाँव की ओर मुड़ती नहीं
और हम अब भी
तुम्हारी थकी आँखों में
अपने सपनों की चमक तलाशते हैं।
बिहार से पंजाब
बंगाल से गुजरात
जहाँ भी तुम गए,
मिट्टी ने तुम्हारा नाम सीखा
आम के बागान
गन्ने के खेत
चूना, सीमेंट, पानी
हर चीज़ ने
तुम्हारा शुक्रिया नहीं कहा।
अब जब बारिश होती है
और शहर की गलियों में कीचड़ भरता है,
मुझे लगता है
यह तुम्हारे पसीने का जवाब है
धरती रो रही है तुम्हारे लिए।
तुम जहाँ कहीं भी हो
ईंट उठाते हुए
या जेसीबी चलाते हुए
या बस अड्डे पर सुस्ताते हुए—
जान लेना
हमने तुम्हें देखा है,
और अब धीरे-धीरे
हम तुम्हारे पाँवों के नक़्शे पढ़ना
सीख रहे हैं
जैसे कोई भूला हुआ गीत
फिर से याद आता है।

Post 4

एक दिन सब कुछ ख़त्म हो जाएगा
हजारों ख्वाहिशें हैं
मगर एक भी पूरी नहीं
कहने को हजारों दोस्त हैं
लेकिन सच्चा एक भी नहीं
भाग रहा हूं लगातार
पर पहुंच कहीं न रहा
चीख चिल्ला रहा हूँ
पर कोई सुन नहीं रहा
मैं महसूस करता हूँ कि
मेरी आत्मा धीरे-धीरे सड़ने लगी है
मैं जाना चाहता हूँ
मैं भाग जाना चाहता हूँ
लेकिन मुझे रुकना होगा
यह वह प्रायश्चित है
जो मुझे चुकाना है
जब तक वह भयावह पेंडुलम
झूलता रहेगा
और मेरा जीवन
धीरे-धीरे मिटता जाएगा
यह एक विकृत खेल है
जिसे हम सब जीने को मजबूर हैं
यह जानते हुए भी
कि एक दिन जीवन
हम सभी को छोड़ देगा।

Post 5

दलित
वो हिंदू थे न मुसलमान
वो थे मेहनतकश इंसान
वो कहीं बाहर से नहीं आए थे
वो मूलनिवासी थे
वो आदिवासी थे
वो जुलाहा थे बंजारा थे
वो भंगी थे तेली थे
वो धोबी थे कुर्मी थे
वो कोरी थे खटीक थे
वो लुहार थे सुनार थे
वो चर्मकार थे महार थे
वो मल्लाह थे कुम्हार थे
ब्राह्मण कहते थे:
वे शुद्र थे, वो अछूत थे
वो म्लेच्छ थे वो राक्षस थे
हाँ वो शुद्र थे अछूत थे
लेकिन भोलेभाले इंसान थे
चालाकी और धोखे से अनजान थे
जब मनु ने कहा वो ब्रह्मा के पैरों से जन्में
उन्होंने पलटकर नहीं कहा
ब्रह्मा कहां से जन्मा
उनकी अपनी कहानियाँ थीं
शासक से शूद्र बनने की
अतिशुद्र बनने की
अछूत बनने की
वो नगर औ’ गांव से दूर थे
जंगलों में रहने को मजबूर थे
हिंदुओं को डर था
उनकी परछाई से भी
वो नगर में आते थे
गले में मटके टांगे
पीछे झाड़ू बांधे
ढोल बजाते हुए
जब सूरज ठीक
सिर पर हो
परछाई लंबी न हो
वो इतने पीटे गए
इतने डराए धमकाए गए
कि वो कभी सिर न उठाए
वो शुद्र थे
अतिशुद्र थे
वो अछूत थे
वो हिंदू थे न मुसलमान
वो यहीं के मूल निवासी थे
वो जानवरों की खाल उतारते थे
चमड़ा तैयार करते थे
वो भंगी थे
वो विद्रोही थे
वो बुनकर थे
वो कपड़ा तैयार करते थे
वो कपड़े सिलते थे
वो लोहे को पिघलाते थे
वो चट्टानों को तोड़ते थे
वो मेहनत करते थे
उनके जिस्म फ़ौलादी थे
वो इरादों में इस्पाती थे
वो संगतराश थे
वो संगीतकार थे
वो दस्तकार थे
वो थे तो हिंदुस्तान था
वो न होते तो
हिंदुस्तान हिंदुस्तान न होता
संविधान न होता
बड़े बड़े महल न होते
ताजमहल लालकिला न होते
वो हिंदू थे न मुसलमान
वो थे मेहनतकश इंसान

Post 6

एक अधूरी उड़ान
आदमी ज़िंदा है
ख़्वाबों के सहारे
ख़्वाबों के सहारे ही
वो पहुँचा चाँद पर
माउंट एवरेस्ट की चोटी पर
ख़्वाबों को पूरा करने के वास्ते
वो दिन रात मेहनत करता है
उस दिन
एक आदमी
ख़्वाबों को पूरा करने के वास्ते
अपनी सरजमीं को अलविदा कहते हुए
पूरे परिवार के साथ
उड़ चला आकाश में
कितना भाव विभोर था
पूरा परिवार
खुशी के मारे
कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी
ऐसा हर व्यक्ति के साथ होता है
बस एक उड़ान थी
एक देश छोड़कर दूसरे देश में
जाना ही था
उसने ज़्यादा कुछ नहीं चाहा था
थोड़ी-सी हवा
थोड़ा-सा सुख
थोड़ी दौलत
थोड़ी शौहरत
कि वह
अपने बच्चों का भविष्य
सुधार सके
पत्नी
जो अस्पताल में
हर दिन दूसरों का जीवन बचाती थी
आज
पहली बार
अपने और अपने परिवार के लिए
एक नई ज़िन्दगी की तलाश में
उड़ चली थी आकाश में
बच्चे
बहुत खुश थे
नए नए ख़्वाब तिर रहे थे
उनकी आँखों में
नया स्कूल
नया घर
नया साजो सामान
नई धरती
नया माहौल
और फिर…
प्लेन क्रैश हो गया
कुछ ही पलों में
न कोई चेतावनी
न कोई अलविदा
बस… सन्नाटा
बस एक ख़बर
और जीवन
जैसे एक अधूरी उड़ान
नोट: यह कविता गुजरात में हवाई जहाज दुर्घटना में मारे गए डॉक्टर दंपति और बच्चों को समर्पित।

Post 7

तुम्हारा जाना
तुम गई…
और मैं बस देखता रहा
ऐसे नहीं कि रोकना नहीं चाहता था,
पर कह नहीं पाया।
मैंने ही कहा था—
“जाओ…”
लेकिन उसी वक़्त
दिल ने धीरे से कहा —
“रुको!”
तुम चलती रहीं,
मैं सुनता रहा
तुम्हारे क़दमों की आवाज़
जब तक
वो आवाज़
आख़िरी मोड़ पर
गायब नहीं हो गई।
तुमने पलटकर नहीं देखा
और मैंने
तुम्हें पुकारा भी नहीं।
मैंने भी सोचा था
किसी बॉलीवुड फिल्म के हीरो की तरह
कि तुम पलटकर देखोगी
लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं
मैं भी चाहता था कि तुम जाओ,
पर ये भी चाहता था
कि तुम रुक जाओ।
तुमने वो सुना
जो मैंने कहा —
पर वो नहीं
जो मैंने नहीं कहा।
मैंने सोचा था
हाथ से कोई इशारा करूँ
पर इशारे
इतनी दूर से दिखते कहाँ हैं?
शायद
मेरी मोहब्बत में ही कमी थी
या तुम मेरी चाहत को समझी ही नहीं थी
तुम गई
और मैं
वहीं बैठा रह गया
उन सवालों के साथ
जिनके कोई जवाब नहीं।cape.

Post 8

स्त्री
स्त्री
हर जगह है
पर हर जगह नहीं है।
वह उस शब्द की तरह है
जो शब्दकोश में नहीं मिलता
लेकिन रोज़ बोला जाता है।
वह माँ है,
वह बहन है,
वह गृहणी है,
पर सबसे पहले —
एक इंसान है
जो गिना तो गया,
गिना नहीं गया।