
परिचय
कैसे लिखूं ….
जीवन के उत्तर काल में कैसे काले बाल लिखूं?
कसावट मांसपेशियों की कैसे सजीले ख़्वाब लिखूं?
अखरोट तोड़ दूं हाथों या दांतों से दावा नहीं अब,
ईख की मिठास इंद्रधनुष के कैसे रंग साफ़ लिखूं?
गर्दन झुकी झुकी सी सायं सायं आवाजें हैं,
ढलती सांझ में कैसे भ्रमर सुमन की बात लिखूं?
पांव भी साथ नहीं चलते तकते छड़ी का मुंह,
कंपकपाते हाथों से कैसे जोशीले जज़्बात लिखूं?
अब अंधेरा लगे मुझे जिसे लोग प्रकाश कहें
लड़खड़ाती जुबां है कैसे बुलंद आवाज़ लिखूं?
मेरी नज़रों से सब अपनी नज़र चुराते हैं,
दुनियावी किस्सों को कैसे प्रभु की सौगात लिखूं?
तारे नज़र से दूर कहीं नींद पलायन कर गई,
सब अच्छा है है सब भला कैसे ये पैग़ाम लिखूं?
खाता हूं, चलता हूं, बतियाता हूं , समझाता हूं,
खुद से रूठूं खुद ही मानूं कैसे सब हाल लिखूं?
दुनिया रंगीली है अच्छी है सुना है, शायद सच हो,
समझ नहीं आता कैसे रहूं कैसे अब प्रस्थान लिखूं?.
Post 2
फरिश्तों से कह दो शैतान से दूर रहें,
वो अपने गिरोह में जबरन हैं मिला रहे।
सरहद पे ज़िंदगी की बैठा हूँ ऐसे
उस पार ही तो अपना देश हो जैसे
बुलाये न बुलाये मादर तो वही है
वहीं से आया हूँ जाना भी वहीँ है
इंतज़ार क्या साथ मिल चलने का
कोई साथ अाया नहीं क्यों जायेगा
वो साथ तब भी ना था जब मैं था
अब मैं नहीं भ्रम क्यों साथ होने का
क़ैद से छूटने के वक़्त की इबादत
जा वक़्त है सूरज के डूब जाने का
कल फिर आऊँगा एक नए रूप में
आज के अधूरे कामों को निबटाने
लौटना कल भी होगा मुझे ज़रूर
ज़िन्दगी के दस्तूर भी हैं निभाने.
Post3
परित्यक्त कब अभिव्यक्त
अशक्त कब अलमस्त
व्यक्त कब विश्वस्त
अधूरा हूं कहां समस्त
रोशनी को कर निरस्त
अंधेरे का अभ्यस्त
उगेगा फिर ये जान लो
हुआ सूरज जो आज अस्त
पहिया है घूमता है
कभी घुटन कभी मस्त
जीवन की बाज़ी लगी हुई
चकनाचूर कभी खुदपरस्त।
शतरंज का खेल जिंदगी
कभी जीत कभी शिकस्त।