
परिचय
मेरी गजलें ही मेरा परिचय हैं
ग़ज़ल —
कुछ दरिया अब राह बदलने वाले हैं
ये जज़्बे सागर को खलने वाले हैं !
इक दूजे को थामे बैठी हैं पलकें
आँखों से सैलाब निकलने वाले हैं !
फिर जख़्मों ने हूक उठाई सीने में
फिर इक दर्द के पंख निकलने वाले हैं !
कुछ सपनों ने तोड़ी हैं फिर सीमाएँ
फिर चादर से पाँव निकलने वाले हैं !
तुझको छोड़ूँ तो वो खुश हो जायेंगे
जो मेरी किस्मत से जलने वाले हैं !
कुछ सैलानी आग सुलगती छोड़ गए
अब मीलों तक जंगल जलने वाले हैं !
nirmal aarya
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post #2
कल कोई कह रहा था कि मैं ख़ुश ख़्याल हूँ
फिर तुमने क्यूँ कहा कि फ़क़त इक वबाल हूँ
अपनी गिरह में बाँध के रख लो मेरी छनक
मैं घुँघरुओं के ज़ेह्न से छिटका ख़्याल हूँ
सब मिट चुके हैं जिस्म से आग़ोश के निशाँ
कुछ लम्स रह गए हैं उन्हीं पर निहाल हूँ
बोझिल सा हो गया है हवाओं सा ये बदन
मैं बारिशों के बाद उड़ाया गुलाल हूँ
ये अच्छी सादगी है कि कुछ भी न कह सकूँ
ये भी न कह सकूँ कि मैं अपनी मिसाल हूँ
वो चुप हैं जिनके पास हजा़रों जवाब हैं
जो ला जवाब हैं मैं उन्हीं का सवाल हूँ
तू इस बदन की चाह ओ छुअन तक रहा मगर
मैं इस तिलिस्मी ज़ात से आगे का हाल हूँ
Nirmal Aarya
post #3
दिल ही दिल में रक्स करूँ और मद्धम सुर में गाऊँ भी
आईने से आँख मिलाकर रंगत पर इतराऊँ भी !
रात को हिज्र के जुगनू पकड़ूँ दिन को यादों की तितली
बाक़ी वक़्तों में तन्हाई को दो-चार सुनाऊँ भी !
कोई मुश्किल काम नहीं है मेरा जीना या मरना
रोज़ सवेरे ज़िंदा होकर शाम ढले मर जाऊँ भी !
यूँ लगता है मेरे सर पर कुछ तो है जो तारी है
ख़ुद ही रो लूँ, ख़ुद चुप हो लूँ , ख़ुद को ही समझाऊँ भी !
इश्क़ का पानी खालिस मय है , डूब चुकी ये तब जाना
फिर गोता खाना पड़ता है कभी जो बाहर आऊँ भी !
तेरे कुर्ते के बटनों को तब टांकूँ जब पहने तू
तेरे जनेऊ की उलझन को हाथों से सुलझाऊँ भी !
Aarya
post # 4
****ghazal …
पूछो न कैसा हाल था जब हम गले मिले
यूँ जैसे एक बूँद से शबनम गले मिले !
पहले पहल तो रूह के देने पड़े जवाब
ये जिस्म का सवाल था जो हम गले मिले !
हमको तो आपसे गिला पिछली दफ़ा भी था
अब की दफ़ा तो आप भी बरहम गले मिले !
कल रात एक ग़म के सिरे फिर से खुल गए
फिर मुझसे टूट टूट के सब ग़म गले मिले !
तन्हाईयाँ नहीं मिलीं हमको तो क्या हुआ
हम बज़्म में ही नज़रों से पैहम गले मिले !
बरसों के इन्तिज़ार ने मुरझा दिए बदन
वो जो दहकते बोसे थे पुरनम गले मिले !
aarya*
post #4
लहरों से लहरें कहती हैं साहिल पर जाने के बाद
कौन भँवर पे लिखे कसीदे, पार उतर जाने के बाद
मेरा क्या है मैं तो वीरानों में रूक जाँऊ लेकिन
दीवारें ख़ुश हो जाती हैं मेरे घर जाने के बाद
जानती हैं वो सब कौमें जो झुकते-झुकते टूट गईं
मिट्टी होना पड़ता है दस्तार उतर जाने के बाद
कुछ रूहें ऐसी होती हैं ज़र्फ़ के बाद निखरती हैं
मुझमें सारी हिम्मत आई मेरे पर जाने के बाद
मत रोको पानी आँखों में थोड़ा-थोड़ा छलकने दो
थामना मुश्किल हो जाता है दरिया भर जाने के बाद
सारा आलम बोसीदा है, मदहोशी है, ख़ुमारी है
तुझको क्या महसूस हुआ मुझसे मिलकर जाने के बाद
Nirmal Aarya

post #5
कच्चे रस्तों का अपनापन अच्छा लगता है !
मिटटी मुझको तेरा दामन अच्छा लगता है !
आँख बचाकर उसके पल्लू से जो पोंछे हाथ
अब भी माँ को मेरा वो फ़न अच्छा लगता है !
थोड़ी-थोड़ी रोज़ मिले जो बादल से सौगात
रुक-रुक कर बरसे जो सावन अच्छा लगता है !
जी कहता है उसकी ख़ातिर सज लूँ थोड़ा और
पर उसको मेरा सादापन अच्छा लगता है !
धूप की तन पे है फुलकारी,और साहिल का सँग
रेत तेरा ये चमकीलापन अच्छा लगता है !
अल्हड़ मिटटी,कचिया बादल और पहली बरसात
सोंधा-सोंधा मन का आँगन अच्छा लगता है !
मंजिल की परवाह नहीं, बस रस्ते हैं और तू
‘निर्मल’ तेरा बंजारापन अच्छा लगता है !
निर्मल आर्या*
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post#6
हमारा तो गिला भी आखिरी है
अब इसके बाद मर्ज़ी आपकी है
त’आल्लुक टूटता जाता है तुझसे
और इसपर दिल को भी चुप सी लगी है
यकायक आँख में बादल सा उट्ठा
यकायक बर्क़ सी दिल पर गिरी है
निभाना यूँ तो कुछ मुश्किल नहीं था
कमी जो भी है सारी दूर की है
कि मुझपर रात दिन तेरे अलावा
उदासी भी मुसलसल बीतती है
वो जिसको इश्क़ कहते हैं जहां में
पतंग से फुलझड़ी की आशिक़ी है
aarya*
post # 7
मेरी गिरह में ज़ियादा जतन से टूट गया
महीन ख़्वाब था हल्की छुअन से टूट गया !
किसी को तर्क-ए-तअल्लुक़ की यूँ सज़ा मत दो
उदासियों ! मेरा नाता सुख़न से टूट गया !
तेरा यक़ीन ही कमज़ोर था मैं क्या करती
ज़रा हवा सी चली और छन से टूट गया !
मुझे हवाओं से हुज्जत न तीरगी से मुराद
मैं वो दिया जो मुसलसल दहन से टूट गया !
मुझे तो तेरे सिवा कौन तोड़ सकता था
मगर बता कि तू किस के दमन से टूट गया !
दमकता रहता था जो मेरी शख़्सियत का गुहर
वो एक रात फिसल कर बदन से टूट गया !
Aarya
post # 8
मेरी गिरह में ज़ियादा जतन से टूट गया
महीन ख़्वाब था हल्की छुअन से टूट गया !
किसी को तर्क-ए-तअल्लुक़ की यूँ सज़ा मत दो
उदासियों ! मेरा नाता सुख़न से टूट गया !
तेरा यक़ीन ही कमज़ोर था मैं क्या करती
ज़रा हवा सी चली और छन से टूट गया !
मुझे हवाओं से हुज्जत न तीरगी से मुराद
मैं वो दिया जो मुसलसल दहन से टूट गया !
मुझे तो तेरे सिवा कौन तोड़ सकता था
मगर बता कि तू किस के दमन से टूट गया !
दमकता रहता था जो मेरी शख़्सियत का गुहर
वो एक रात फिसल कर बदन से टूट गया !
Aarya.
post #9
उफन उफन किलोलतीं औ बूझतीं पहेलियाँ
समुद्र के नगर चलीं पहाड़ की सहेलियाँ।
रँगीनियों की डोरीयाँ सुगंधियों की बोरियाँ
पहाड़ पर खुली पड़ी हैं सृष्टि की तिजोरियाँ ।
पहन के कोट बर्फ का जो सर्दियाँ मिलीं गले
सजल हुईं धवल हुईं पहाड़ियों की चोटियाँ।
मटक-मटक के शाम को घरों को लौटती हुई
पहन के गर्म जर्सियाँ पहाड़ियों की छोरियाँ।
है सुर्ख़ फूल-फूल तो जवान पात-पात है
सजी हुई हैं द्वार-द्वार मोतियों की डोलियाँ।
कमान पर बसंत की पहाड़ का लड़कपना
मदन के तीर खा के मस्त हो रही हैं वादियाँ।
खिले -खिले पलाश से किशोर हैं पहाड़ के
दबी-दबी हँसी सी हैं पहाड़ की किशोरियाँ।
aarya*