Welcome to the world of हरियाणवी कवि मनजीत सिंह (खान मनजीत भावड़िया "मजीद")

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परिचय

किताबी नाम – खान मनजीत भावड़िया “मजीद”
कागज़ी नाम – मनजीत सिंह
बाबू का नाम – श्री भूप सिंह
मां का नाम- श्रीमती किताबो देवी
पढ़ा लिखा – एम ए ( समाजशास्त्र, उर्दू) ,बी एड
जन्म- 4 अप्रैल 1985
किताबां के नाम-हरियाणवी झलक (हरियाणवी काव्य संग्रह), सच चुभै सै ( हरियाणवी काव्य संग्रह), हकीकत (उर्दू कविता), बिराणमाट्टी (हरियाणवी नाटक)
घुमन्तुभाष- 09671504409
अणुडाक – manjeetbhawaria@gmail.com
जहां रहण की – गांव भावड़, तह गोहाना, जिला सोनीपत-131302
सम्प्रति – सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र
जुड़ा हुआ -महासचिव विकास शिक्षा समिति भावड सोनीपत, जनवादी लेखक संघ हरियाणा
इज्जत वो मान -राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान हरियाणा, जनवादी लेखक संघ हरियाणा, विकास शिक्षा समिति भावड सोनीपत हरियाणा, शैली साहित्य मंच रोहतक, हिंदी साहित्य प्रेरक संस्था जींद, प्रगतिशील लेखक संघ जगलपुर, जाम्भाणी साहित्य अकादमी बीकानेर, कॉमनवेल्थ गेम 2010में स्वयंसेवक की भूमिका निभाई, ज्ञानोदय साहित्य संस्था कर्नाटक, हिंदी साहित्य परिषद लातूर
अन्य-हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी और हरियाणा के कवि सम्मेलन व मुशायरे में कविता पाठ और आकाशवाणी रोहतक में कविता प्रस्तुत ‌।

© मनजीत सिंह  Copyright

Post #1

ना रह्या वो कुणबा काणबा
ना रह्या वो मेल – जोल
ना रह्या वो हस्सी ठठ्ठे
ना रह्या वो पनघट नीर
ना रह्या वो कुआं बावड़ी
ना रह्या वो छाज छाबड़ी
ना रह्या जोहड़ में नाहणा
ना रह्या वो तलाब सरोवर
ना रह्या वो चुल्हा हारा
ना रह्या वो सीपी खुरचण
ना रह्या वो टसरी पगड़ी
ना रह्या वो मड़कन जूती
ना रह्या वो मिट्टी तेल और दिवा
ना रह्या वो झाकरा पिहाण
ना रहे वो मेहनती पशु पखेरू
ना रह्या वो हार सिंगार
ना रह्या वो हथफूल टीक्का
ना रह्या वो केंदू का पेड़
ना रह्या वो काग काबर
ना रह्या वो बाज व चील
ना रह्या वो देशी खाणा
ना रह्या वो देशी गाणा
ना रह्या वो हाळी पाळी
ना रह्या वो पलंग निवार
ना रह्या वो साळ बिसाळा
ना रह्या वो बळदा की चुरासी
ना रह्या वो रैहडा़ ना अरथ
ना रह्या वो जेळवा ना बेलुआ
ना रह्या वो पळवी पळवा
ना रह्या वो बात वो सूत
ना रह्या वो पीढ़्या पाटड़ी
ना रह्या वो रस्सा नेत
ना रहता वो खुद्दा खाद्दा
और के बताऊं

© मनजीत सिंह  Copyright

Post #2

खोटा ज़माना
घणा माड़ा टेम आग्या
परिवार कुमबे की इज्जत ढेर
एक बुझे रोटी की
दुसरा कह खा गा के
कौन सी रोटी
मोटी मोटी रोटी
पतली पतली रोटी
फूली होड़ रोटी
बिना फूली रोटी
तन्नै ना बेरा रोटी का
रोटी होवे सै चार ढ़ाल की
पहली रोटी हो सै मां की
जिसमें ममता, प्यार अर वात्सल्य हो सै
इसके गेल्यां गेल्यां स्वाद भी
पेट भर ज्या पर मन नी भरदा
दूसरी रोटी हो सै घरवाली की
जिसमें समर्पण अर प्यार हो सै
या स्वाद तो होव सै
मन अर पेट दोनों भर ज्या सै
तिसरी रोटी हो सै बुढ़ापे की
जो पुत्रवधू बणाकै देवे
जिसमें आदर सत्कार सम्मान होवे सै
स्वाद का पता नी मन भरज्या है
चौथी रोटी का के जिक्र करू मैं
या होव सै काम आळी बाई की
जिसमें ना पेट भर था
ना मन भरदा
ना स्वाद
ना ज़ायका
बस एक सै
चारो रोटी औरत के
हाथ म्ह होकर जावै सै
क्योंकि औरत के अन्दर
होती है
ममता, प्यार, वात्सल्य,
समर्पण,आदर, सत्कार
ज़माना खोटा न्यू सै
जो पहले था वो ईब नी।

© मनजीत सिंह  Copyright

Post #3

रागनी थाली लौटे आला सूं ं

खान मनजीत भावड़िया मजीद
मेरे मन में सब की चिन्ता , जबर भरोटे आला सू
दिन रात कमाऊ मैं फेर भी , थाली लौटे आला सू
पता नहीं बोझ तले , सै पीढ़ी कौन सी म्हारी रै ,
मूंछ होती जा रही आज , दाढी तै भी भारी रै ,
दे रहा कर्जा बाप का रै , इब सै बेटा की बारी रै ,
किस पै करु यकीन मै , बाड़ खेत नैखारी रै ,
चोर लुटेरे साहूकार होगें , मैं टोटे आला सू
दिन रात कमाऊ मैं फेर भी , थाली लौटे आला सूं
दिन रात हाड़ तुड़ाए , मेरी आई सही करड़ाई
मेरा बहता खून पसीना , मेरे तै दिया राह दिखाई
ऊंची – ऊंची महल अटारी , मन्नै तै सदा शिखर – चढ़ाई
रेल बस मेरी मेहनत , मन्नै सड़क तक बिछाई ,
तू कार जहाज में ऐश करे , मैं बुग्गी झोटे आला सूं
दिन रात कमाऊं मैं फेर भी , थाली लौटे आला सूं
पा तुड़ाऊ ईंट ढोऊ , महल बणवाऊं साहूकारा कें ,
हाथ जलै सै फैक्ट्री मैं , सब पुर्जे सै थारी कांरा कै ,
थाम गाबरु अस्सी तक कै , सा हम बुढ़े सत्रह – ठारा कै , आज तक मेरे दम पै , मालिक बणे थम बहारां कै ,
थाम बणो सो मेरे कारण बड़े , मै सबलै छोटे आला सूं
दिन रात कमाऊं मैं फेर भी ,. थाली लौटे आला सूं
मेरे कमाई मेरे घर में , ना दिखाई दे री ,
भूखा सै आज कमेरा , न्यू होगी दूबाढेरी ,
आगै लिकड़गै बहोत घणे , ना कीमत सै आज मेरी ,
किसे के ना समझा मे आरी , समझाण की कोशिश करी भतेरी ,
बणाए हुए सिक्के चाल्ये मेरे , मै सिक्का खोटे आला सूं दिन रात कमाऊं मैं फेर भी , थाली लौटे आला सूं
थामनै जादू मानया इसा , हाथ फेरा आख्यां पैं ,
जाति धर्म का करो बटवारा , बाधी पट्टी मेरी आख्यां पैं , ऊँच नीच तमनै राखी सदा दिखा के साहसी आख्यां पैं , खान मनजीत तू बोवला होरा , कमा के घमेरी आख्यां पै , घणा व्होत चुप रहग्या मै , मै चालै मोटे आला सूं ,
दिन रात कमाऊं मैं फेर भी , थाली लौटे आला सूं

© मनजीत सिंह  Copyright

1.लघु कथाएँ -धापा की कताब

कहाणी-1
धापा की कताब
धापा ने एक पुराणी कताब टोहंदी टोहंदी मसूस कर रही सै के एक खूबसूरत आवाज़ आयी पन्ने पलटदे पलटदे पाठकां की फुसफुसाहट कर अलमारियों म्ह तें सामान खंगालते होये पाठकां कताबां की फुसफुसाहट से गूंज रहा सै। धापा एक रोज आण आली पाठक सै‌। इस जगह न धापा बहुत पसंद करै सै। अर पुराने कागज़ां और स्याही की महक ने उसकी आत्मा मैं सुकून दे दिया सै। फेर भी आज वह सही सही किताब खोजण के मिशन पै सै‌
उसने आपणी उँगलियों को किताब की जिदल अर पन्ना पर सावधानी तै हाथ उच्च फिराया सै अर आपणी आँख्या ते उस व्यक्ति को ढूँढ़ रही सै जिसने उसते बात की सै। आखिर में, उसकी नज़र चमड़े तै बंधी एक पुरानी किताब पै पड़ी जिस के जिल्द पै एक चांदी का कव्वा छपा होड़ सै। उस ने कताब को रैक तै निकाला अर कताब का जाना-पहचाना वजन उसके हाथां म्ह एक सुहाता हाथ उसकी उपस्थिति नै एक तरह मसूस करण लाग रहा था। उसने उसे खोल्या कर कपड़े का एक छोटा सा रूमाल पाया जिसमें नाजुक फूलों की कढ़ाई बणा राख्यी थी । यह वह पुराणी किताब टोहंदी टोहंदी रही जिसकी उसनै तलाश थी।
वह संतुष्टि से मुस्कुरायी। पुराणी कताब जमाए एक दम सही थी। कपड़े का एक छोटा सा टुकड़ा जिसतै उसकी पसंदीदा कहाणी में अपनी जगह बणा ली सै। जैसे सूरज नै सरड़क पर लंबी परछाई बणा दी हो धापा किताबों की दुकान तै बाहर निकल गी। अर उसने आपणा पराणी किताब नै कस के पकड़ राख्या था, इसी शांत उम्मीद के साथ कि वह उस जगह पै वापस लौटेगी अर जहां वह किताबों के पन्नों की फुसफुसाहट अर सरसराहट सुण सकैगी

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2.लघु कथाएँ -बदला

कहानी -2
बदला
जितणे घणे घणे घण्टे तक मैं जागूं सूं उतणे घण्टे मेरा मन बदला लेण की होड़ लाग्यी रह सै।हर घण्टे मन्नै ब्होत घणे घणे सुपणे आण लाग रे सै। घण्टे मैं नये नये सुपणे केवल अर केवल बदला लेण के आंवे सै कै बदला क्यूकर लिया जा सकै सै। उसनै मेरे तो मारण की घणी त्यारी कर ली थी।जो आपणे मन म्ह याहे सोचण लाग रह्या सै के इसती किस तरह मारा ज्या सकै सै। हर सपणे म्ह दिखण आली बात न मैं हर दम तक त्यार करण लाग रह्या सूं के इब आगे मन्नै कै करणा सै। मैं मौके की तलाश में फिरण लाग रह्या सूं। वह उस दन पसतावैगा जिस दन वह मेरे साह्मी आवैगा। उसनै मेरे ते ठूकरा दिया सै अर दूसरा अपणा लिया सै। आपणी गोझ म्ह तै ब्लेडा निकाला अर घणा जोर तै पकड़ राख्या था। वा पिच्छे तै उस अणजाण जोड़े गेल्यां मिली अर मेरे घरां ए पहोंच गी। घरां आक वा इतणा हासंण लाग्यी जमा आंख्या में आंसू ले आयी हो पर उसकी हांस्सी म्ह भी मन्नै घणी मीठी मीठी लाग्य थी। गुड़ अर शक्कर बरगी। फेर वा मीठी मीठी आवाज तक बोलण लाग्यी। जणू इसी बात उसनै कंधे ना करी हो। इसी आवाज मैं ब्होत घणे दनां म्ह सुणण लाग रह्या था।जो उसके होंठों तै ब्होत दनां म्ह सुणी सै। जितणा वा याद कर सकै थी उसने उतणा याद करण की कोशिश करी सै ‌। क्या वा यूं काम आपणी खातर करण लाग रह्यी थी या बात कुछ और थी इस बात का तो पता नहीं था। के यूं एक नया तरीका टो लिया था बात करण का। जिसा मन्नै उसकी तरफ देख्या वा मुड़ी अर उड़ तै भाग गी। जो ब्लेडा, चक्कू मन्नै बदला लेते खातर लिया था वो उड़ेंए छोड़ दिया सै‌।म्ह आपणै आग्य की सोचण लाग्या अक के करणा है।उसकी टोह म्ह दौड़ पड़ा। बदला धरा धराया रह गया

3.लघु कथाएँ -याद

कहानी -3
याद
कदे तमनै टुटदै तारे तै भरोसा करा सै मेरे तै उसनै बुज्झा अक इस मैं कोई बराई तो ना है कदे मेरे गेल भुण्डी बणजा इसै सोच फिकर में दन रात रहे जा सूं।कदे बराई मेरे सर ना धरी जा मन्नै भी ब्होत घणा बचणा पड़ेगा ‌कदे सर पै कोए बराई ना जड़ी जा।मैं उसकी तरफ इक प्यार भरी नज़रा तै देखण लाग रह्या था।वा भी मन्नै देख कै उड़े ए रूक गी। मैं छात प कुरसी घाल्ले बैठा था अर मेरी चारों ओड़ गमले धरै थे।मैं बालकनी में बैठ्या बैठ्या सोच रहा था के मैं इस बिनाटेम आली दुनिया नै दैखण की पूरी पूरी कोसिस करण की फिराक म था।जे मन्नै पसंद आज्या । उसनै मेर त कुछ नहीं कहा फेर भी मैं उसनै चाहूं सूं। उसनै किसे भरोसे कसमां वादा की कोए जरूरत नहीं सै। जल उसनै मेरे तो बुज्झा के क्या वा आपणे कमरे म जाण न त्यार है कै अक नहीं पहल्या तो इसका बुज्झा पाड़ना पडैगा। तो उसनै घणी ऊंची आवाज त ज़बाब दिया। मेरी तबियत ठीक नी सै। नरस मन्नै लिजाण म्ह कम त कम पन्द्रह मिनट ओर लेगी। उसने मेरे त खोए होड़े आखरी दान्दा तै हासण लाग रह्यी थी। अर उसनै जरसी बणाणदी बणाणदी मेरी कान मुंह फेर के देखण लाग रह्यी थी ‌के पिच्छे तै उसके चांदी के बालां का। मजाक बणाया था मेरे व बात आज तक याद सैं।

4.लघु कथाएँ -मन बणा कै काम करणा

कहाणी-4
मन बणा कै काम करणा
बात मारण म तै हम सब तै आगं सै। चै प्रे दन कर ल्या। हामनै कोणसा किसे का मुंह पकड़ राख्या सै। पर हाम बात कितनै काम की करां हां मैन बात तै या सै।जै आम किसै काम काज की बात करां तै उस काम नै मन लगा क करना ब्होत घणा जरूरी हो ज्या सै। म्हारा सारा का सारा ध्यान उससै काम म्ह होता चहिए जो हाम चा रै सां। जिब्बे हाम उस काम म्ह कामयाबी मिल सकै सै ‌जै काम नै हाम ध्यान लगा कै नी करांगे तो म्हारे काम की इतनी अहमियत नी होगी अर वो काम हामने मन बणा के करना पड़े गा। नहीं तै आप उस काम नै बढ़िया ढाल नी कर पावेंगे ‌।
पढण आले बालकां क साथ घणी घणी बार यूहे देखण न मिले सै के वं पढ़ जरूर सै पर घणखरी बार उनका ध्यान और कड़े रह सै।कहण का मेरा मतलब यू सै कै मोबाइल फ़ोन अर मनरजंन करण म्ह घणा ध्यान लगाये राख्खे सै।हाम घणखरी बार यू ए प्रदर्शन करण लाग रहे सै।अगर हाम इस तरहां करां तै हम अपणे कामयाबी तै पिछड़ जावां सां अर दूर हो जावां सां ।
घणखरी बार हाम देखां सा कै जो काम हाम करण लाग रहे सां वो मन बणाके नी करदे अगर हाम मन बणाके ध्यान लगा कै काम करां तो हम सीधे कामयाब की तरफ़ हो ज्या वां गें।

5.लघु कथाएँ -भल्ले- रामकली का ब्याह

कहाणी-5
भल्ले- रामकली का ब्याह
सुरजा घणा परेशान हो लिया था अर एक सरड़क के कनारे कनारे जाण लाग रह्या था। उसने चालदे चालदे एक चा का खोखा दिखाई दिया। जड़ें भरपाई पहलाए चा पीण लाग रह्यी थी। भरपाई की लड़की बाहर कान्ही आई जिसका ना रामकली था। रामकली देशी बाणे में उस दकान पै बैठी थी।सुरजा बोल्या “कै कर ली सै ऐ छोरी?” न्यू बोल्यी ताऊ आज एक ब्याह सै जिसमें मन्नै जाणा सै अर वा छोरी मेरी गेल्यां पढ़ा करदी। जिसका आज ब्याह सै। अर सुरजा सोच म्ह पड़ग्या सुरजे की आंख अन्दर तक धंस गी।जमाए सिकुड़ सी गी। एक धुन में मस्त हो के सोचण लाग्या अक कुण सी छोरी सै वा। वा कदे कार्ल गर्ल तो नी सै। कदे भी नहीं हो सकदी मन्नै तै वा बालकपण तै देख राख्यी सै। इसी छोरी वा कदे भी नी हो सकदी। ‌सुरजा आपणा सर हलाण लाग्या। तन्नै के बेरा भरपाई सुरजे तै कहण लाग्यी अर जोर जोर तै घणी भुंडी ढाल हासण लाग्यी।सुरजा बोल्या तन्नै उसते कदे बताया सै अक नी । तन्नै बेरा है वा तेरी सब तै घणी दल तै चाहण आली सै अर तेरी तै घणी कसूती ढ़ब्बण सै। ठीक सै तन्नै जो बात मन्नै सोच राख्यी थी वा हे मन्नै सोच राख्यी थी। जो तेरे दमाक में बात आई वा हे बात मेर मन भी आई। घणी परानी बात कोन्या पांचे साल पहलां की सै।मेरे न्यू की न्यू याद सैं।जब वा भाजण दौड़न गई अर वा जीत ना पाई। मन्नै तै घणा बुरा लाग्या था। भरपाई उसतै बदला लेण लागरी सै सुरजा कह इसै ज़ुल्म ना करें करा करदे।
तुम भरपाई बिना जाणे पिछाणे छोरे तै भला छोरी का ब्याह क्यूकर करदां।तू घणी स्याणी ना बणे आज टेम बदल ग्या सै। तेरे जमाए लाज शर्म कोन्या, रामकली की आंख्या रो रो के जमा बावली हो रही सै।नम हो गी। रामकली आंख्या तै आंसू पुछण ला गी।कहण ला गीत कोए तो मेरे साथ आया। मेरा ताऊ सुरजा ए ठीक लिकड़गा। जिसते रामकली दन रात तक चाह्या करदी मैं उस तै ए ब्याह रचाऊंगी। जिसका ना भल्ले सै। भल्ले न मन्दर में ले जाके ब्याह कर लिया। भरपाई तै चीख के कहण लाग्यी तन्नै तो मेरा नाश कर दिया था। अब हांसी- खुशी तै जीवण बीतण लाग्या।

6.लघु कथाएँ-रामफल की यात्रा

कहानी -6
रामफल की यात्रा
2005 के शासनकाल के दौरान रामफल नाम का एक व्यापारी रोहतक में रहता था। रामफल एक अमीर व्यापारी नहीं थे; लेकिन उसके पास छोटी सी संपत्ति और एक छोटी सी दुकान थी। रामफल ने यह संपत्ति अपनी कड़ी मेहनत और बचत से अर्जित की। इसीलिए वह आराम से रहता था।
एक रात रामफल ने एक सपना देखा। सपने में एक बूढ़ा आदमी उसे गुस्से से देख रहा था और कह रहा था: रामफल कुरुक्षेत्र धाम पर जाओ। कुरुक्षेत्र धाम की यात्रा करें. जाओ, मेरी अवज्ञा मत करो!
सुबह रामफल ने सपने के बारे में सोचा, लेकिन जब एक ग्राहक उसकी दुकान पर आया तो वह इसे भूल गया। जब शाम हुई तो वह बिस्तर पर गया और उसी बूढ़े आदमी को देखा और वही बातें सुनीं। सुबह रामफल ने थोड़ी देर तक सपने के बारे में सोचा। तीसरी रात रामफल ने स्वयं धाम को देखा। रामफल नींद से जाग गया और खुद से कहा: यह बहुत ज्यादा है! यह राजा मुझसे क्या चाहता है? कुरुक्षेत्र धाम जाने में कोई समस्या नहीं है. मैं एक मुस्लिम व्यक्ति हूं और सभी कर्तव्यों का पालन करता हूं। लेकिन मैं अपना यह देश नहीं छोड़ना चाहता। हाँ! नहीं, वह बूढ़ा आदमी डरावना है… मैं कुरुक्षेत्र धाम पर जाऊंगा; क्योंकि में कर सकता हूँ। क्या मुझे कुरुक्षेत्र धाम पर जाना चाहिए? क्या मैं राजा के शब्द सुन रहा हूँ?
रामफल ने बहुत देर तक सोचा. अंततः उन्होंने कुरुक्षेत्र धाम पर जाने का निर्णय लिया; इसलिए उसने अपनी दुकान बेच दी, अपना घर किराये पर दे दिया, और कुछ मूल्यवान माल लेकर कुरुक्षेत्र धाम
में बड़ी रकम में बेचने चला गया।
जब रामफल ने सब कुछ तैयार कर लिया तो उसने पाया कि उसके पास एक हजार रूपए हैं। रामफल को उस पैसे की ज़रूरत नहीं थी और वह उसे कुरुक्षेत्र धाम ले जाने से डर रहे थे। रामफल ने मन ही मन कहा: यदि कोई चोर यह धन चुरा ले तो मेरी सारी संपत्ति नष्ट हो जायेगी। मुझे ये पैसे छुपाने होंगे. मैं इसे कहां रखूं?
रामफल ने घर को देखा और पैसे को किसी गड्ढे में छुपाने के बारे में सोचा। लेकिन उसने खुद से कहा: अगर कोई खोदेगा, तो उसे मिल ही जायेगा। मैं इसे अपने व्यापारी मित्र सूरजा के पास अमानत में छोड़ दूँगा। रामफल ने एक बड़ा जार और जैतून खरीदे। फिर उसने पैसे जार में डाल दिए और उसके ऊपर जैतून के फल तब तक रखता रहा जब तक जार भर नहीं गया। फिर उसने उसे कसकर बंद किया और उसके मालिक सूरजा के पास ले गया। रामफल ने सूरजा से कहा: मैं कुरुक्षेत्र धाम पर जाना चाहता हूं, मेरे दोस्त, लेकिन मेरा एक ट्रस्ट है। मैं चाहता हूँ कि जब तक मैं अपनी यात्रा से वापस न आ जाऊँ, तुम जैतून का यह बर्तन अपने पास रखो।
व्यापारी सूरजा मुस्कुराया और कहा: चिंता मत करो, मेरे दोस्त! ईश्वर की इच्छा से जब तक आप अपनी यात्रा से सुरक्षित वापस नहीं आ जाते, मैं इसे अपने पास रखूंगा। मैं खुश हूँ; क्योंकि तुम्हें मुझ पर भरोसा है. तब सूरजा ने रामफल को गोदाम की चाबी दी और कहा: यह चाबी लो, मेरे गोदाम में जाओ, और जहां चाहो वहां जार रख दो। और वापस आने के बाद उसी स्थान से बर्तन ले जाना। रामफल ने सूरजा को धन्यवाद दिया, जार को स्टोर रूम में रख दिया और फिर आश्वस्त होकर यात्रा पर निकल पड़ा।
कुरुक्षेत्र धाम की यात्रा करने के बाद रामफल कुरुक्षेत्र धाम से लाए गए सामान को बेचने के लिए बाजार गए। जब वह बाजार में था, तो दो व्यापारी उसके सामान के सामने खड़े हो गये। दोनों व्यापारी रामफल के माल से बहुत प्रभावित हुए और उनमें से एक ने अपने दोस्त से कहा: अगर यह आदमी अपना माल कोड़ियां के दाम में बेचे तो बहुत पैसा कमाएगा।
रामफल ने उन दोनों व्यक्तियों की बातें सुनीं, उन पर काफी देर तक सोचा और फिर पिण्डारा धाम के लिए रवाना हो गये। रामफल बहुत सारा पैसा कमाना चाहता था और पिणडारा की उन प्राचीन वस्तुओं को देखना चाहता था जिनके बारे में हर कोई बात कर रहा था। जब वह वहां पहुंचा तो उसने अपना माल बहुत ऊंचे दाम पर बेचा; उसे ख़ुशी महसूस हुई; क्योंकि उसने उन दोनों व्यक्तियों की बातों पर विश्वास कर लिया था। रामफल ने सोचा: इस हरियाणा नराज्य के लोगों को यह नहीं मालूम कि दूसरे पड़ोसी राज्यों में क्या है। मैं सूरजा से सामान खरीदूंगा और उन्हें काफ़ी बचत में बेचूंगा।
रामफल ने सूरजा के समान की खोज की और कुछ लोगों ने उन्हें बताया कि यह कारवां दस सप्ताह बाद रवाना होगा। इसलिए वह पिरामिड और स्फिंक्स देखने के लिए गीता धाम चले गए। रामफल ने पिणडारा में घूमकर सामान खरीदना शुरू कर दिया। जब यात्रा का समय आया तो उन्होंने अपना सामान बांधा और कुरुक्षेत्र के लिए रवाना हो गये।

7#ज्योतिसर गांव एक सांस्कृतिक विरासत


महाभारत से पहले बसा जिसका पुराना नाम जोसर था । गांव के साथ सरस्वती नदी बहती है। भीष्म कुण्ड भी नरकातारी गांव में है । राजस्व विभाग के दस्तावेज में जोसर नाम दिया गया है ‌। ज्योतिसर की संस्कृति विरासत के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए, मैं हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिला का उदाहरण देना चाहूंगा। यह गांव समृद्ध संस्कृति, विरासत और रीति-रिवाजों को दर्शाता है। इस गांव के माध्यम से हर समाज व हर धर्म के लोगों के संघर्ष और संस्कारों को जिंदा रखने के तरीके को दिखाया गया है। जो कि एक समृद्ध संस्कृति का प्रतीक है। यहां श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। जो एक सांस्कृतिक विरासत के रूप में हरियाणा सरकार ने यहां महाभारत से सम्बन्ध रखने वाला संग्रहालय अनुभव केन्द्र के रूप में बनाया गया है शाम को होने वाली महाभारत पर आधारित लाइटिंग शो बहुत शानदार है।ज्योतिसर की संस्कृति विरासत के कुछ मुख्य पहलू:परंपरागत रीति-रिवाज हर समाज में परंपरागत रीति-रिवाजों का विशेष महत्व है, चाहे वो किसी भी धर्म से संबंधित हो सभी यहां पर दिपावली, होली, ईद, गुरू नानक, गोरखनाथ, यह माता का मन्दिर ,दादा खेड़ा, इस्कॉन मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा आदि भी पूजा व इबादत एक तरह से सांझी संस्कृति और विरासत को जीवंत बनाते हैं।लोक संस्कृति ज्योतिसर तीर्थ पर आधारित फिल्में और संगीत उनकी लोक संस्कृति को प्रदर्शित करते हैं। ज्योतिसर के हर समाज व जाति का ग्रामीण जीवन उनकी संस्कृति और विरासत का एक अभिन्न अंग है। जो विभिन्नता में एकता का प्रतीक है।हालांकि, है गांव ज्योतिसर की संस्कृति विरासत के बारे में विशिष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन ज्योतिसर में भी हरियाणवी संस्कृति की बात करें, तो इसकी सादगी, अपनापन, और समृद्ध विरासत ने विदेशी मेहमानों के दिलों को छू लिया है। वे देसी हुक्के और खाट पर बैठकर गांव की तस्वीरें संजोते हैं ज्योतिसर में विभिन्न त्योहारों और संस्कृतियों का समावेश है,ज्यौतिसर में विभिन्न प्रकार की लोक संस्कृतियां हैं, जैसे कि हरियाणवी, और पंजाबी मुख्य भाषा है। हिन्दू धर्म की जनसंख्या सबसे ज्यादा है । जहां अनेकों गुज्जर, ब्राह्मण मेरी जानकारी में इस गांव में गुर्जर और ब्राह्मण सरपंच भी रहा है। जाहिर है उनके अनेकों घर हैं।एक मोहल्ले में राईं राजपूत,कश्यप राजपूत, रामदासिया यादव ,गडरिया, बांदी, बाजीगर और कुछ घर धीमान जाति रहती है जबकि मुस्लिम में जोगी, लोहार, कुम्हार आदि सिकखों में मजहबी, जाट आदि ग्रामीण जीवन एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में स्थित एक कस्बा है। यह एक हिन्दू तीर्थ है जो कुरुक्षेत्र-पहोवा मार्ग पर थानेसर से आठ किमी पश्चिम में स्थित है। माना जाता है कि यहीं पर भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। ‘ज्योति’ का अर्थ ‘प्रकाश’ है तथा ‘सर’ का अर्थ ‘तालाब’।पवित्र वटवृक्ष जिसके नीचे भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। यहाँ एक बरगद का वृक्ष है जिसके बारे में मान्यता है कि इसी वट वृक्ष के नीचे कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया था और यहीं अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाया था। वट व्रक्ष के निचे चबूतरे का निर्माण महाराजा दरभंगा ने करवाया था।थानेसर को पहले स्थानेश्वर कहा जाता था राजा हर्षवर्धन यहां के शासक रहे हैं। थानेसर में कुरुक्षेत्र जिला का मुख्यालय भी स्थित है और थानेसर कुरुक्षेत्र जिला की तहसील भी है। लेकिन यहां का रेलवे स्टेशन कुरुक्षेत्र जंक्शन के नाम से जाना जाता है। कुरुक्षेत्र-नरवाना रेलवे ब्रांच लाइन का स्टेशन ‘थानेसर रेलवे स्टेशन’ नाम से जाना जाता है ग्रामीण जीवन एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्र , प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी मौजूद है ज्योतिसर वह जगह है जहां गीता का जन्म स्थान पवित्र ज्योतिसर कुरुक्षेत्र का सबसे सम्मानित तीर्थ है। ऐसा माना जाता है कि महाभारत युद्ध ज्योतिसर से शुरू हुआ, जहां युद्ध की पूर्व संध्या पर अर्जुन को गीता के शासक भगवान कृष्ण से अनन्त संदेश मिला। ऐसा कहा जाता है कि आदि शंकरचार्य ने ईसाई युग की 9वीं शताब्दी में हिमालय के रहने के दौरान इस स्थान की पहचान की है। 1850 में कश्मीर के एडी किंग ने तीर्थ में एक शिव मंदिर का निर्माण किया। फिर 1924 में, दरभंगा के राजा ने पवित्र बरगद के पेड़ के चारों ओर एक पत्थर मंच उठाया, जो भक्तों के अनुसार गीत गेल के गीत का सबूत है। 1967 में कांची काम कोठी पीठा के शंकरचार्य। पूर्व में सामना करने वाले मंच पर गीता को दिखाते हुए रथ स्थापित किया गया। अतीत में तीर्थ प्राचीन मंदिर शामिल हो सकता है, लेकिन मध्ययुगीन काल में आक्रमणकारियों के क्रोध के कारण वे बनाए नहीं जा सके। 9वीं -10 वीं शताब्दी के इस तरह के मंदिर के स्थापत्य सदस्य मंदिर के मुख्य मंच पर रखा गया है। हरियाणा, पर्यटन यहां शाम को हिंदी और अंग्रेजी में एक साउंड शो चला रहा है। जितनी जनसंख्या गांव की है उसमें मूलनिवासी कम है जबकि प्रवासी ज्यादा बसे हुए हैं।शिक्षा के मन्दिर में राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, सुर्योदय उच्च विद्यालय, ज्योति विद्या मंदिर , इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट सम्मिलित हैं।इस गांव की जनसंख्या 11000 के करीब है जबकि 2011 की जनसंख्या अनुसार 6500 थी। इस गांव में 70.2 प्रतिशत लोग साक्षर हैं महिलाएं 60 प्रतिशत है। चार बड़े अधिकारी भी इस गांव के सरकारी विभागों में कार्यरत हैं । मौजूदा विधायक अशोक कुमार अरोड़ा व पूर्व परिवहन मंत्री भी इसी गांव से हैं ।5-7 प्रतिशत बच्चे हर साल स्कूल छोड़ने वाले होते हैं। यहां का मुख्य व्यवसाय कृषि ,भवन निर्माण , खेतीहर मजदूर है । यहां गेहूं ,धान आलू, प्याज़ गन्ना मुख्य खेती है। जिसमें लोग अपने परिवार और समुदाय के साथ रहते हैं। ज्योतिसर मैं राष्ट्रीय संस्कृति निधि की स्थापना की है, जो देश की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए काम करती है। संस्कृति एक जटिल और बहुस्तरीय अवधारणा है, जिसमें एक समाज के मूल्यों, विश्वासों, रीति-रिवाजों, परंपराओं, और कलात्मक अभिव्यक्तियों का समावेश होता है। यह एक समाज की साझा पहचान और विरासत को दर्शाती है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है एक समाज के मूल्यों और विश्वासों का समावेश, जो उनके जीवन को आकार देते हैं।एक समाज के रीति-रिवाज और परंपराएं, जो उनके जीवन को एक विशिष्ट दिशा देती है समाज की कलात्मक अभिव्यक्तियां, जैसे कि संगीत, नृत्य, चित्रकला, और साहित्य।एक समाज की भाषा और संचार के तरीके, जो उनके विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने में मदद करते है। एक समाज की साझा पहचान को दर्शाती है, जो उनके बीच एकता और एकजुटता को बढ़ावा देती है।संस्कृति एक समाज की विरासत को दर्शाती है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है। संस्कृति एक समाज के लोगों को एकजुट करती है, जो उनके बीच सामाजिक एकता को बढ़ावा देती है। यहां पर हर धर्म के लोग रहते हैं जो आपसी तीज त्यौहार में सब मिलकर सरीक होते हैं।

युवा को नशे से दूर कैसे करें

युवा को नशे से दूर कैसे करें
जो युवा आज जीवन जी रहे हैं उन युवाओं का जीवन संवारने और उनको मार्गदर्शन करने की बहुत जरूरत है।यदि वे अत्यंत उदास मनोदशा में हों, तो आत्म-क्षति और आत्महत्या की प्रवृत्ति में भी उतर जाते हैं यदि वे आक्रामक हो रहे हैं (आमतौर पर शराब के सेवन के संबंध में, सुखा नशा करने के सम्बंध में) तो स्थिति को शांत करें जब कोई लड़का नशे में घर आता है, तो यह पता लगाने की कोशिश करने के बजाय कि उसने क्या-क्या पीया है, सबसे अच्छा उपाय यही है कि आप जो लक्षण देखते हैं, उनसे निपटें। नशे में धुत व्यक्ति को संभालने के लिए क्या लक्ष्य और प्राथमिकताएँ होनी चाहिए, इस पर विचार करना ज़रूरी है।कुछ सामान्य चीजें हैं जो आप सभी परिस्थितियों में कर सकते हैं:उन्हें सुरक्षित रखने और उनकी भलाई की निगरानी पर ध्यान केंद्रित करें‌।शांत रहें और उन्हें आश्वस्त करें‌।उन्हें जगह दें और पर्यावरणीय उत्तेजना को कम करें।सूचना के अतिभार से बचें।सावधानी बरतें और आवश्यकता पड़ने पर आपातकालीन सेवाओं से संपर्क करें।जिस एजेंसी के लिए आप काम करते हैं या जिसकी सहायता से आप काम करते हैं, उसके द्वारा प्रदान की गई योजनाओं या प्रक्रियाओं का पालन करें।यदि युवा व्यक्ति निम्नलिखित तरीकों से प्रस्तुतीकरण कर रहा है तो कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना होगा।यदि वे नींद में हों, धीमे हों, अनियंत्रित हों, ‘सो रहे हों’ या आक्रामक हो रहे हों।उन्हें बहुत सारी जानकारी समझने में कठिनाई होगी, इसलिए एक समय में केवल एक ही प्रश्न पूछने का प्रयास करें या सरल, ठोस विचारों के बारे में बात करें।यह उनसे बात करने या उनके परिणामों के बारे में निर्णय लेने का समय नहीं है। यह अगले दिन तक इंतज़ार किया जा सकता है। ऐसा केवल तभी ज़रूरी होगा जब बात उनकी या दूसरों की सुरक्षा की हो।यदि वे ‘तेज’, भ्रमित, अव्यवस्थित, शोरगुल वाले, चिन्तित, क्रोधित या आक्रामक होने की ओर प्रवृत्त हों‌।शांत, स्पष्ट, चिंतित स्वर का प्रयोग करें।इस बात पर ज़ोर दें कि आप चाहते हैं कि वे सुरक्षित महसूस करें।आसपास के अन्य लोगों के प्रति सचेत रहें और उनके लिए भी कोई स्थान ढूंढने का सुझाव दें।।बातचीत को आगे न बढ़ाएँ। चिंता दिखाने से मदद मिल सकती है।किसी भी निर्णय या परिणाम को अगले दिन तक टाल दें।उन्हें भीड़ में न रखें और वातावरण में उत्तेजना कम करें जैसे कि कोई लोग न हों, कम रोशनी हो, शांति होयदि आपको लगता है कि वे कुछ मनोविकृति लक्षणों का अनुभव कर रहे हैंयुवा लोग मादक द्रव्यों के प्रभाव में होने या उनसे दूर रहने पर मतिभ्रम या अत्यधिक व्यामोह जैसे कुछ मनोवृत्ति का अनुभव होता हो‌‌।उनके आस-पास ऐसी चीजें कम करें जो उनकी इंद्रियों पर अधिक भार डाल सकती हैं और उन्हें सुरक्षित, शांत स्थान पर ले जाएं।उनकी निगरानी करें और आवश्यकतानुसार या निर्देशानुसार चिकित्सा सहायता लें‌।बाहर घूमते समय, नीचे आते समय या पीछे हटते समय एक युवा व्यक्ति भी भांग या हेरोइन जैसे नशीले पदार्थों का सेवन करते समय अत्यधिक चिंतित और उत्तेजित हो सकता है। यह आक्रामकता में बदल सकता है, खासकर जब उनके लक्ष्यों में बाधा उत्पन्न हो। उस समय आसपास के अन्य लोगों और उनकी प्राथमिकताओं पर विचार करें।दूसरी ओर, हो सकता है कि उन्हें तीव्र लालसा या आवेग का अनुभव हो रहा हो, जिसे कभी-कभी सहायता और ध्यान भटकाने से ‘दूर’ किया जा सकता है। हालाँकि, उन्हें वापसी के लक्षण भी हो सकते हैं। एक युवा व्यक्ति भरपूर सहायता और ध्यान भटकाने से इनसे उबर सकता है, हालाँकि कुछ मामलों में उसे चिकित्सीय सहायता की आवश्यकता हो सकती है, इसलिए लक्षणों पर नज़र रखें और ज़रूरत पड़ने पर उचित सहायता प्राप्त करें।नशे के कारण युवा चोरी करना सीख रहे हैं। इंजेक्शन लेनै का नशा आज जोरों शोरों से कर रहे हैं।आज हमें पंजाब और हरियाणा के युवाओं को बचाने और संरक्षित करने की बहुत जरूरत है। युवाओं में नशे के कारण नपुंसकता का भी बढ़ावा हो रहा है नशे से बसे घर उजड़ रहें हैं