ग़ज़लकार डॉ संजीव कुमार
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© इस पृष्ठ की समस्त बौद्धिक संपदा अधिकार ‘डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’‘ के पास सुरक्षित हैं। बिना पूर्व लिखित अनुमति के किसी भी भाग की अनुकरण, पुनर्प्रकाशन या वितरण प्रतिबंधित है।

“© Copyright of this page is held by Dr.Sanjiv Kumar Anjum All rights reserved.”

परिचय

नाम    :   डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’
पिता का नाम  :   श्री राम रत्त्न
माता का नाम : श्रीमति कौशल्ल्या देवी
जन्म तिथि :13 दिसम्बर 1976
शिक्षा : एम ए ,एम एड , पी-एच डी .
शिष्यत्व : प्रो एस पी शर्मा ‘तफ्ता’ ज़ारी
सम्मान : संस्कार भारती कुरुक्षेत्र द्वारा कला विभूति सम्मान
अखिल भारतीय साहित्य परिषद् हरयाणा की फरीदाबाद शाखा द्वारा साहित्य सेवा सम्मान
व्यवसाय :प्राध्यापक अर्थशास्त्र ,शिक्षा विभाग ,हरियाणा सरकार
साहित्यिक पद : सचिव ,अदबी संगम कुरुक्षेत्र
साहित्यिक क्षेत्र में योगदान:
 आकाशवाणी कुरुक्षेत्र द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनों एवं मुशायरों में शिरकत
विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनों /मुशायरों में शिरक़त
अदबी संगम कुरुक्षेत्र की तरफ से कवि सम्मेलनों एवं मुशायरों का आयोजन एवं प्रबंधन

पता : गाँव व डाक खाना संघौर ,उप तहसील बाबैन
जिला: कुरुक्षेत्र (हरियाणा ) 136156
मोबाइल :09812284321

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright


ग़ज़ल #1

© इस पृष्ठ की समस्त बौद्धिक संपदा अधिकार ‘डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’‘ के पास सुरक्षित हैं। बिना पूर्व लिखित अनुमति के किसी भी भाग की अनुकरण, पुनर्प्रकाशन या वितरण प्रतिबंधित है।

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आजकल वो उदास रहता है
जो मेरे आसपास रहता है
ओढ़ता था कभी शराफ़त जो
वही अब बेलिबास रहता है
जब ख़ुदा का क़याम हो दिल में
आदमी बेहरास रहता है
प्यार होता है दिल में जब पैदा
फिर न होशो –हवास रहता है
वादा अपना वफ़ा करेगा वो
मुझको ऐसा क़यास रहता है 

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

ग़ज़ल #2

हर इक इन्सां का दुनिया में अजब ही फ़लसफ़ा देखा
सभी की ज़िन्दगी का अपना अपना ज़ाविया देखा
कोई तनहा,अकेला चीख़ता देखा ज़माने में
कोई इक दूसरे की आग में जलता हुआ देखा
किसी को चैन है , आराम है, हर सुख है दुनिया में
किसी की ज़िन्दगी में हर क़दम पर हादसा देखा
यहाँ रोता हुआ देखा कोई औलाद की ख़ातिर
यहीं औलाद के पीछे किसी का सर झुका देखा
जहां सर फोड़ कर रोता हुआ देखा था इक आक़िल
वहीँ, इक शख्स, ख़ुद से बेख़बर , हंसता हुआ देखा
ज़माने की हर इक शै में ख़ुदा का ही करिश्मा है
मगर इन्सां के दिल ने ख़ुद को रब से भी बड़ा देखा

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

ग़ज़ल #3

आज जब मुझ से मेरी बात हुई
ख़ुद से वाक़िफ तभी हयात हुई
दिल की दुनिया में जब हुआ मातम
मुज़महिल सारी कायनात हुई
एक दिन रोज़ बीत जाता है
आज फिर दिन के बाद रात हुई
मुद्दतों बाद आज दिल जीता
अक्ल की दिल से आज मात हुई
जो न हरगिज़ पसन्द थी दिल को
फिर वही उन से आज बात हुई 

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

ग़ज़ल #4

कितने ज़ख्म हुए तन मन में
जब दीवार हुई आँगन में
कौन अपना है कौन पराया
क्या रक्खा है इस उलझन में
भूल के सारी दुनियादारी
आओ लौट चलें बचपन में
पूछ के देखो उस बिरहन से
कितने अश्क बहे सावन में
ऐब औरों में ढूंढने वालो
झाँक तो लो ख़ुद भी दरपन में
ख्वाब सुनहरे बन लो ‘अंजुम’

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

ग़ज़ल #5

ज़माने में उसी इन्सां को जीने का सलीक़ा है
नज़ाकत वक़्त की जो शख्स दुनिया में समझता है
ये दुनिया है, यहाँ देखा नहीं जो भी वही अच्छा
यहाँ जो सीधा लगता है वो पेचीदा निकलता है
ख़ुशी भी टिक न पाई देर तक , औक़ात क्या ग़म की
ख़ुशी का, ग़म का, ये क़िस्सा मुसलसल ,यूं ही चलता है
ख़ज़ां के दौर से इतना न डर , ये बीत जाएगा
बहारें आ ही जाती हैं कि जब मौसम बदलता है
चमकने वाली चीज़ों से मैं अक्सर मात खाता हूँ
जिसे गौहर समझता हूँ वही पत्थर निकलता है
ये दुनिया खेल है शतरंज ,जिसमें हर कोई मोहरा
वहीं वो मात खाता है,जहां अक्सर संभलता है
हमेशा ख़ुश रहें ,आबाद हों ,बच्चे फलें फूलें
यही इक ख्वाब हर माँ बाप के सीने में पलता है 

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

ग़ज़ल #6

जो अपने मुल्क अपनी कौम का सम्मान करता है
वो जानो-तन वतन के नाम पर कुर्बान करता है
उन्हीं के दम से क़ायम हैं जहां में रौनकें अपनी
शहीदों की इबादत सारा हिन्दुस्तान करता है
शहादत की ख़बर बेटे की जब आती है सरहद से
है बीटा और इक बाक़ी पिता ऐलान करता है
मैं भारत का सिपाही हूँ , मेरी हिम्मत है लासानी
मेरा दुश्मन भी मन ही मन मेरा गुणगान करता है
शहीदों के लिए खुल जाता है जन्नत का दरवाज़ा
यक़ीनन उनका इस्तक़बाल ख़ुद भगवान करता है
अगर मौका  मिले ‘अंजुम’ उतारूं क़र्ज़ मिट्टी का
हर इक जाबांज़ पैदा दिल में ये अरमान करता है 

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

ग़ज़ल #7

कशिश क्या है तेरी तिरछी नज़र में
उतर जाती है जो सीधी जिगर में
बचा सकती है ख़ुद को ग़ैर से वो
नहीं महफूज़ औरत अपने घर में
न जाता उसके दर पर मैं यक़ीनन
न होता जो तेरा घर रहगुजर में
भटक कर ही गुज़ारी जिंदगानी
मेरा हमराह था ग़म ही सफ़र में
कहाँ मुमकिन तेरी दुनिया में यारब
कमी बिल्कुल न हो कोई बशर में 

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

ग़ज़ल #8

जिससे ये दिल लगा नहीं होता
शख्स वो दिलरुबा नहीं होता
जानो-तन दे के भी महब्बत में
हक़ वफ़ा का अदा नहीं होता
बात करता है वो ख़ुदा जैसी
जिसको कुछ भी पता नहीं होता
नीचे गिर कर वही संभलता है
जो नज़र से गिरा नहीं होता
कौन सच्चा है कौन झूठा है
उम्र भर फ़ैसला नहीं होता 

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

ग़ज़ल #9

मुझ पे अपने पराए लोगों ने
ज़ुल्म क्या क्या न ढाए लोगों ने
ज़िक्र जब भी हुआ महब्बत का
किस्से क्या क्या सुनाये लोगों ने
वक़्त का रुख बदलते ही देखो
रंग क्या क्या दिखाए लोगों ने
आज आँखों से आ गए आंसू
आज हम यूँ रुलाये लोगों ने
अब तो जीनामुहाल कर डाला
घर पे बैठे बिठाए लोगों ने

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

ग़ज़ल #10

वो जो दुनिया में होता है
हमने जी भर के देखा है
बातें तो छोटी छोटी थी
जाने फिर क्यों घर बिखरा है
मेरे दिल में तुम रहते हो
तुमसे दिल का रिश्ता क्या है
नज़रें धोखा खा सकती हैं
लेकिन दिल अपनी कहता है
अब के सावन बिन साजन के
फिर आँखों में ही गुज़रा है 

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

ग़ज़ल #11

अजीब शख्स है नज़रों से वार करता है
वो एक तीर से सौ सौ शिकार करता है
ख़ुद अपने बारे में जिसको पता नहीं कुछ भी
वो सबके बारे में बातें हज़ार करता है
वफ़ा की राह पे जो शख्स ख़ुद नहीं चलता
वो दूसरों को बहुत शर्मसार करता है
वही बदलता है खुशियों को ग़म की आंधी में
खजां की रुत को वही पुर बहार करता है
वफ़ा ,खुलूसो महब्बत उसी को है हासिल
जो अपनी ख्वाहिशों को दरकिनार करता है 

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

ग़ज़ल  #12

दिल की लगी न दिल्लगी की बात हम करें
सबके दिलों पे प्यार की बरसात हम करें
आँखों में अब न नींद है, रातें उदास हैं
इक आरज़ू है फिर से मुलाक़ात हम करें
दिल में न कोई खौफ ,न वेह्शत जहां में हो
अब रंजिशें रखें न खुराफात हम करें
उसने गले लगा के बस इतना कहा मुझे
आ दोस्ती से दुश्मनी को मात हम करें
हरसू ख़ुदा के नूर से रौशन है ज़िंदगी
आओ की उसकी याद में कुछ बात हम करें 

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

ग़ज़ल  #13

ज़ात मज़हब में बट गई जब से
ज़ीस्त ख़ुद में सिमट गई तब से
दीनो –ईमां से है किसे मतलब
आदमी हो गया बड़ा रब से
सारी दुनिया है बस में लालच के
भूख रिश्वत की बढ़ गई जब से
लौट कर फिर न आ सकी वापस
बात निकली जो इक दफा लब से
ग़म वो भीतर छुपा के रखते हैं
मुस्कुरा कर जो मिलते हैं सब से 

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

ग़ज़ल #14

दिल की हालत ज़बां से आगे है
राज़े हस्ती बयाँ से आगे है
जो हैं अहले खिरद वो क्या जानें
इश्क़ सूदों –ज़ियाँ से आगे है
ज़ीस्त है नाम ख़ुद शनासी का
ज़ीस्त वहमों गुमां से आगे है
क्यों सिमटने लगे हो तुम ख़ुद में
लामकां तो मकां से आगे है
वो पहुँच कर रहेगा मंजिल पर
शख्स जो कारवां से आगे है
कौन समझेगा उस हक़ीक़त को
जो हक़ीक़त बयां से आगे है
शम्मे ईमां की रौशनी ‘अंजुम’
शाने कोनो मकां से आगे है 

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

ग़ज़ल #15

सबकी बातों को कान में रखना
अपनी मंजिल भी ध्यान में रखना
खिल उठेगा ये गुफ़्तगू का चमन
बात मीठी ज़बान में रखना
झूठ ,आखिर में हार जाता है
तुम हकीकत बयान में रखना
काम मुश्किल है नीचे आना भी
ध्यान अपना ढलान में रखना
जिन सवालों का हल नहीं कोई
अब न वो दरमियान में रखना 

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

ग़ज़ल #16

ज़िन्दगी का जो था आसरा ले गई
बाढ़ आई तो सब कुछ बहा ले गई
साथ मेरे चली वो क़दम दो क़दम
दिल, जिगर, रूह,जां क्या से क्या ले गई
ख्वाब आँखों से मेरी जुदा यूँ हुए
धुप शबनम को जैसे उदा ले गई
अपने बीमार बच्चे की ख़ातिर वो माँ
बेच कर अपनी अस्मत दवा ले गई
हसरतें ,ख्वाब ,घर –बार इसके सिवा
ज़िंदगी हम गरीबों से क्या ले गई

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ग़ज़ल #17

महक जाये ये दुनिया इतना बरसे प्यार होली में
मिटा कर दूरियां सबसे मिलो इस बार होली में
हरे ,पीले ,गुलाबी ,लाल रंगों से खिले चेहरे
नज़र फूलों से देखो आते हैं रुखसार होली में
किसी के हाथ में पानी किसी के हाथ पिचकारी
कहीं थाली में रंगों के लगे अम्बार होली में
कलाई में खनकती चूड़ियाँ हंस हंस के कहती हैं
सलीके से करो सब प्यार का इज़हार होली में
नज़ाक़त में शरारत में ज़रा तहज़ीब शामिल हो
किसी से भी जियादा मत करो तकरार होली में
चलो फिर एक हो जाएँ भुला कर सब गिले –शिकवे
यही पैगाम लाई रंगों की बौछार होली में 

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ग़ज़ल #18

ज़हन में जब से अदावत आ गई
ज़ीस्त में तब से क़यामत आ गई
मैं भी दे सकता था दुश्मन को जवाब
हर दफा आड़े शराफ़त आ गई
जिसने हक़ छीना किसी मज़लूम का
यूँ समझ लो उसकी शामत आ गई
ज़ात की मज्हब्की हर दीवार को
अब गिराने की ज़रुरत आ गई    
प्रश्न बस माँ –बाप को रखने का था
सामने घर की हक़ीक़त आ गई 

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

ग़ज़ल #19

जो अपने बालो-पर कोतोलते हैं
कहाँ वो लहद से बढ़कर बोलते हैं
हुआ करती है जब दरिया की साज़िश
भंवर में तब सफीने डोलते हैं
ज़बां रखते हैं जो खामोश अपनी
निगाहों से वो अक्सर बोलते हैं
वो छू सकते हैं इक दिन आसमां भी
जो हिम्मत से परों को खोलते हैं
झुका करते हैं उनके सर यकीनन
पलट कर जिनके बच्चे बोलते हैं 

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

ग़ज़ल #20

मुझ से मुंह मोड़ के घर छोड़ के जाने वाला
खो गया भीड़ में वो शख्स हंसाने वाला
दोस्त सब ग़ैर नज़र आने लगे हैं मुझ को
कोई लगता ही नहीं साथ निभाने वाला
आज भी याद मुझे आ ही गई फिर उसकी
वो न आया कभी फिर रूठ के जाने वाला
तुम मेरे पास थे लगती थी ये दुनिया अपनी
अपना अब लगता नहीं कोई ज़माने वाला
गाँव में आज भी रहते हैं सभी मिल- जुल कर
भीड़ में खो गया हर शहर में जाने वाला
उसके मरते ही बहुत हो गए वारिस उसके
जीते जी कोई न था पानी भी पिलाने वाला
सुबह होते ही निकल आएगा सूरज फिर से
रात का आख़िरी तारा भी है जाने वाला 






© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright



ग़ज़ल #21

हाथों में फूल तो कभी पत्थर लिए हुए
आता है मेरे दर पे मुकद्दर लिए हुए
हर शख्स अपने आप में दुनिया समेट कर
फिरता है इक जहान ही अन्दर लिए हुए
इक तयशुदा सी ज़िंदगी जीकर मैं थक गया
मैं ज़ीस्त में था ख्वाहिशें अक्सर लिए हुए
रस्मो रिवाज तोड़ के जाता मैं किस तरफ
जीता रहा समाज की चादर लिए हुए
उसने मुझे करीब से जाना नहीं कभी
मैं ज़हन में था प्यार का सागर लिए हुए
गुज़री जो मेरे दिल पे मुझे याद भी नहीं
फिरता हूँ दिल में ग़म का समंदर लिए हुए 

© डॉ संजीव कुमार ‘अंजुम’ Copyright

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