ग़ज़लकार सूबे सिंह सुजान
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साहित्यिक व जीवन परिचय

नाम- सूबे सिहं “सुजान”
पिता- श्री अमर सिहं,
माता-श्रीमती शकुंतला देवी ,जन्म दिनांक-21फरवरी 1974,जन्म स्थानःगाँव-ईशाकपुर जिला-कुरूक्षेत्र,हरियाणा,भारत।
शिक्षा- एम.ए.,एम .फिल. हिंदी साहित्य,डिप्लोमा इन एजुकेशन तथा एम.ए.-मानवाधिकार।
पद एवं सेवाः-प्राथमिक अध्यापक के पद पर कार्यरत हैं।
साहित्यिक परिचयः- आठवीं कक्षा से ही हिंदी के कवियों की कवितायें पढ़ते पढ़ते कविता लिखने की रूचि पैदा हो गई थी बारहवीं कक्षा में आते आते ग़ज़ल में रूचि बढ़ गई मुख़्यत कविता व हिंदी ग़ज़ल लिखते हैं। ग़ज़ल लेखन की शिक्षा ग्रहण की उस्ताद सत्य प्रकाश “तफ़्ता” ज़ारी से, तफ़्ता जी ऊर्दू अरूज़ के जाने माने उस्ताद हैं वे अरबी,फ़ारसी,उर्दू के ज्ञाता हैं । प्रोफेसर सत्य प्रकाश तफ़्ता ज़ारी साहब के पास डॉ ओम प्रकाश अग्रवाल ज़ार साहब की जानशीन रही थी।इसके अतिरिक्त लघुकथा, कहानी व लेख इत्यादि पर भी लेखनी की आज़माइश है।
प्रकाशित पुस्तकः- “सीने में आग” हिंदी ग़ज़ल संग्रह दिसम्बर 2007में हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत व सहयोग से प्रकाशित।
चार सांझा संग्रहों में ग़ज़ल प्रकाशित तथा एक ग़ज़ल संग्रह व एक कविता संग्रह प्रकाशन हेतु तैयार है व शीघ्र प्रकाशित होंगे।
इसके अलावा जुलाई 1995 में टी.वी. कार्यक्रम “गीत बहार”में एक ग़ज़ल का चयन हुआ ( हैं उनसे मेरे कुछ अनजान से रिश्ते, क्या नाम दूँ मैं उन्हें जो हैं बेजान से रिश्ते ) जिसे बाद में अनुराधा पौडवाल व नितिन मुकेश जी ने स्वरबद्ध किया।तथा आदेश श्रीवास्तव द्वारा संगीतबद्ध किया गया है। इसके अलावा अरूण शर्मा द्वारा एक ग़ज़ल को आकाशवाणी रोहतक आकाशवाणी कुरूक्षेत्र के लिये शास्शत्रीय संगीत में स्वरबद्ध किया जा चुका है। इसके अलावा मेरी ग़ज़लें मृणालिनी अखौरी,सुधीर शर्मा, सत्यम आनंद ने ग़ज़ल गाई हैं। दिल्ली आकाशवाणी पर एक सामाजिक श्लोगन प्रतियोगिता में पुरस्कृत।
पत्र व पत्रिकाओं में प्रकाशनः- दैनिक ट्रिब्यून, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, व पब्लिक इंडिया पाक्षिक ,यश बाबू ,एवं साहित्यिक पत्रिकाओं में हरिगंधा,नवगीत,हंस ,सरस सलिल,रूप की शोभा, अमेरिका से प्रकाशित सेतु व कंई वैब पोर्टलों में रचनायें प्रकाशित होती रहीं हैं।तथा फेसबुक पर निरंतर लेखन। कवि सम्मेलनों में निरंतर भाग लेते रहे हैं व कवि सम्मेलनों का आयोजन करते रहते हैं जालंधर पंजाब, बेहट, उत्तर प्रदेश, देहरादून,उत्रांचल, सोनीपत,पानीपत,कैथल, रोहतक,जींद,हांसी, हरिद्वार, हस्तिनापुर,मेरठ, अंबाला, चंडीगढ़ , पंचकूला,फरीदाबाद,गुरूग्राम,करनाल,भरतपुर,राजस्थान,दिल्ली में विभिन्न कवि सम्मेलन, मुशायरों में भाग लेते रहे हैं। अदबी संगम कुरूक्षेत्र के दो बार सचिव पद पर व वर्तमान में अध्यक्ष के पद पर सेवा कर चुके हैं। पिछले 25 वर्षों से अदबी संगम में काम किया है इसके अतिरिक्त सार्थक साहित्य सभा कुरूक्षेत्र के सदस्य रहे हैं और स्वतंत्र कवि मंच , साहित्यिक संस्था का गठन किया और राष्ट्रीय स्तर के बीस कवि सम्मेलनों का सफल आयोजन किया।
सम्मानः- कैथल साहित्य सभा,माँ माधुरी बृज सेवा सदन अपना घर संस्था भरतपुर राजस्थान,अदबी संगम कुरूक्षेत्र, हिंदी साहित्य मंच करनाल, हिंदी साहित्य प्रेरक संस्था जींद,अखिल भारतीय प्रेरणा साहित्य सभा कुरूक्षेत्र,कस्तूरी साहित्य सभा सोनीपत, साहित्य कलश परिवार पटियाला,सागरनामा साहित्य मंच हांसी,हिसार,अखिल भारतीय साहित्य परिषद फरीदाबाद व हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित।
सम्पर्कः- गाँव- सुनेहडी खालसा, डाक. सलारपुर, जिला- कुरूक्षेत्र,

Email : subesujan21@gmail.com

ग़ज़ल #1

वो तो कहते हैं,ये दरवाजा कभी खुलता नहीं।
और सच ये है, कि उसने खोल कर देखा नहीं।।
घूमती रहती है उसके इश्क में वो हर घड़ी,
इस ज़मीं के दर्द को सूरज कभी समझा नहीं।
आँख से आँसू का बहना है जरूरी दोस्तों,
जो कभी बहता नहीं,कहते उसे दरिया नहीं
हर ग़ज़ल कविता में उसकी बात गहरी होती है,
उसको ये लगता है, मैं उसको कभी लिखता नहीं।
बोलता, तो है वो अब, मैं इसलिए ख़ामोश हूं,
जब तलक मैं बोलता हूं,वो मेरी सुनता नहीं।
ज़िन्दगी भर जैसा चलता है,सफर चलता रहे,
सब मुसाफिर मारे जाते हैं,सफर मरता नहीं।
चाँद सूरज तक को देखा हमने लालच की नज़र,
रोज़ घटता बढ़ता, लेकिन चाँद को ख़तरा नहीं।

© सूबे सिंह सुजान Copyright

ग़ज़ल #2

जो घर बने थे नदी किनारे
नहीं रहे अब किसी किनारे।
कि बोलने वाले बोलते हैं,
नहीं बनाये सही किनारे।
हमीं पे इल्ज़ाम आ गया है,
हमीं नहीं थे किसी किनारे।
बनाने वाला ही जानता है,
कहां नदी तोड़ती किनारे।
कोई तो मजबूरी होगी उसकी,
लगा गया दोस्ती किनारे।
चलाने वाला नहीं रहा अब,
खड़ी रही नाव भी किनारे।
नहीं रहेंगे, पहाड़ से दुख,
कभी लगेगी खुशी किनारे।
कि उम्र भर धीरे धीरे हमको,
लगा रही ज़िन्दगी किनारे।
न लिख सका,ठीक ठाक अब तक,
अभी लगी शायरी किनारे।
ज़माने भर में भटक लिए हो,
लगा भी दो दुश्मनी किनारे।
ख़्याल से सब बंधे हुए हैं,
नहीं कोई आदमी किनारे।
यहीं नदी बीच बस गये थे,
जगह मिली थी इसी किनारे ।

© सूबे सिंह सुजान Copyright

ग़ज़ल #3

मुद्दा असल, कहीं ओर भटका दिया गया।
इज्ज़त को बेच डाल, ये समझा दिया गया।।
रिश्ते नहीं जरूरी, सियासत जरूरी थी,
तो भाइयों की नाक को कटवा दिया गया।
जब तक न टूट जाएं, सियासत जरूरी थी,
हम मिल न पाएं, इसका भी पहरा दिया गया।
असली कसूरवार तो पद पर बने रहे,
फांसी पर बेकसूर को लटका दिया गया।
सच्चाई जिस किताब में तुमने लिखी “सुजान”
वो पृष्ठ भी क़िताब से हटवा दिया गया।

© सूबे सिंह सुजान Copyright

ग़ज़ल #4

लोग दिल टूटने के बाद सुधर जाते हैं
जैसे टूटे हुए पत्थर भी संवर जाते हैं
नासमझ लोग कभी ठीक समझते ही नहीं,
इसलिए लोगों की नजरों से उतर जाते हैं।
जीने वाले ही सही काम नहीं कर पाते,
मरने वाले तो सही वक्त पे मर जाते हैं।
इक सड़क हूँ मैं, बनाते हो मिटाते हो तुम,
गालियाँ दे दे मुझे, लोग गुजर जाते हैं।
मुंह उठा,घर से चला आया,न सोचा समझा,
आज क्या उनसे कहेंगे ,जो उधर जाते हैं ।
बेवजह जीने का लालच कभी रहता ही नहीं,
अपनी खुशबू को लुटा फूल बिखर जाते हैं।

© सूबे सिंह सुजान Copyright

ग़ज़ल #5

एक जैसा, कभी नहीं होता
सिर्फ़ अच्छा, कभी नहीं होता।
आज आऊंगा, रोज़ कहता है,
उसका आना, कभी नहीं होता।
प्यार होता है खट्टा मीठा भी,
किन्तु फीका, कभी नहीं होता।
चांद चक्कर लगाए धरती के,
चांद भूखा, कभी नहीं होता।
मैं बुरा हूँ, मुझे पता भी है,
ख़ुद बताना, कभी नहीं होता।
मुस्कुराहट खुशी से उठाता हूं,
ग़म उठाना,कभी नहीं होता।
प्यार यूं बार बार भी होगा
पहले जैसा,कभी नहीं होता।
ज़िन्दगी भर सभी अधूरे हैं,
कोई पूरा,कभी नहीं होता।
झूठ, केवल अज्ञान के परदे,
कोई झूठा,कभी नहीं होता।

© सूबे सिंह सुजान Copyright

ग़ज़ल #6

हर किसी की हाँ में हाँ करता नहीं हूँ
इसलिए मैं आदमी अच्छा नहीं हूँ।
लोग मुझसे इसलिए कटने लगे हैं,
तयशुदा रस्तों पे मैं चलता नहीं हूँ।
मुझमें उतरो प्यार के मोती चुरा लो,
मैं समंदर हूँ मगर गहरा नहीं हूँ।
मेरी कोशिश, मौत से जाकर कहूँगा,
देखिये मैं आज तक ठहरा नहीं हूँ।
कह रहा हूं तेरी बातों को समझ कर,
मैं तुझे ही आज तक समझा नहीं हूँ।
तेरे दिल की सुनने से फ़ुरसत नहीं है,
अपने दिल की इसलिए कहता नहीं हूँ।
मैं अभी से एक कच्चा फल हूँ लेकिन,
देखिये बाज़ार में,कच्चा नहीं हूं।

© सूबे सिंह सुजान Copyright



ग़ज़ल #7

ये फूल की किस्मत है, दो दिन में बिखर जाना
लेकिन उसे आता है, हँसते हुये मर जाना
हर रोज अँधेरा है, हर रोज उजाला है,
डरना न कभी मुश्किल राहों से गुजर जाना
बादल को महब्बत से धरती यूँ बुलाती है,
छम-छम से बरसना औ’ सीने में उतर जाना
आदत ये सियासतदानों की बड़ी गन्दी है,
चूहों की तरह अपना ही देश कुतर जाना
दीवाने हमेशा सीना ठोंक के कहते हैं,
रोने से तो अच्छा है, हँसते हुये मर जाना
अरदास गरीबों की, सरदी से बचा लो तुम,
ऐ-धूप हमारा आँगन प्यार से भर जाना

© सूबे सिंह सुजान Copyright

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